मध्य हिमालय (कुमाऊँ क्षेत्र) प्राचीन एवं मध्यकालीन प्रस्तर स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। बैजनाथ-गरुड़, द्वाराहाट, बागेश्वर, कटारमल, जागेश्वर, मोहली-दुगनाकुरी, थल, वृद्धभुवनेश्वर-बेरीनाग, जाह्नवी नौला-गंगोलीहाट तथा बालेश्वर-चंपावत आदि मंदिर समूह प्राचीन और मध्यकालीन कुमाउनी मंदिर स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मंदिर स्थापत्य कला के साथ-साथ मध्य हिमालय में मूर्ति कला का भी विकास हुआ। देव…
मणकोट-गंगोलीहाट का प्राचीन इतिहास
मणकोट नामक स्थान जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट तहसील में स्थित है। इतिहासकार प्राचीन गंगोली राज्य के विभिन्न राजवंशों को मणकोट से संबद्ध करते हैं। ‘‘कत्यूरी-राज्य के समय तमाम गंगोली का एक ही राजा था। उसके नगर दुर्ग का नाम मणकोट था। राजा भी मणकोटी कहलाता था।’’ मणकोट का सामरिक महत्व देखें, तो यह दुर्ग एक…
नंदा-सुनंदा-उत्तराखंड की आराध्य देवियाँ
नंदा का उल्लेख- नंदा-सुनंदा उत्तराखंड की आराध्य देवियाँ के साथ-साथ एक सांस्कृतिक पहचान भी है। सांस्कृतिक पहचान के साथ नंदा देवी अपना एक भौगोलिक पहचान को धारण किये हुए है। नंदादेवी उत्तराखण्ड हिमालय की सबसे ऊँची चोटी है, जिसकी ऊँचाई 7817 मीटर है। यह पर्वत उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में 30° 22’ 33’’ उत्तरी अक्षांश…
सरयू और पूर्वी रामगंगा- गंगोली की नदियां
कुमाऊँ का ‘गंगोली’ क्षेत्र एक विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक क्षेत्र है। इस विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र को सरयू-पूर्वी रामगंगा का अंतस्थ क्षेत्र भी कह सकते हैं। वर्तमान में गंगोली का मध्य-पूर्व और दक्षिणी क्षेत्र पिथौरागढ़ तथा मध्य-पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्र बागेश्वर जनपद में सम्मिलित है। गंगोली क्षेत्र पूर्व, पश्चिम और दक्षिण में दो नदियां…
एक हथिया देवाल स्थापत्य कला और दंत कथा-
स्थापत्य- एक हथिया मंदिर की कुल ऊँचाई 10 फीट 2 इंच है। मंदिर की कुल लम्बाई मण्डप सहित 8 फीट 2 इंच तथा चौड़ाई 4 फीट 1 इंच है। इस प्रकार मंदिर की लम्बाई और चौड़ाई में 2 और 1 का अनुपात है। इस एकाश्म मंदिर का आधार शिलाखण्ड की लम्बाई 16 फीट…
कुमाऊँ का कैलास मंदिर-एक हथिया देवाल
कुमाऊँ का एक मात्र एकाश्म प्रस्तर से निर्मित प्राचीन मंदिर पिथौरागढ़ जनपद के थल नगर पंचायत के निकटवर्ती बलतिर और अल्मिया गांव के मध्य में स्थित है। इस एकाश्म मंदिर को ‘एक हथिया’ कहा जाता है। शैली व कालक्रम के आधार पर इतिहासकार इस मंदिर को दशवीं सदी के आस पास का बतलाते है। इस…
प्रागैतिहासिक पुरास्थल बनकोट- ताम्र उपकरण
बनकोट पुरास्थल उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जनपद के नवनिर्मित गणाई-गंगोली तहसील में स्थित एक पर्वतीय गांव है, जिसे ब्रिटिश कालीन पट्टी अठिगांव, परगना गंगोली, जनपद अल्मोड़ा में के रूप में चिह्नित कर सकते हैं। जिस पहाड़ी की उत्तरी पनढाल पर बनकोट गांव बसा है, उसके दक्षिणी पनढाल में सरयू नदी प्रवाहित है। इस गांव के उत्तरी…
उत्तराखण्ड : प्रागैतिहासिक से ताम्रयुग तक
उत्तराखण्ड का भूवैज्ञानिक इतिहास आद्य महाकल्प के द्वितीय युग ‘इयोसीन’ से आरम्भ होता है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार इस युग में टेथिस सागर के स्थान पर हिमालय का निर्माण आरम्भ हुआ और यह प्रक्रिया निरन्तर जारी है। जबकि आरम्भिक मानव का इतिहास पांचवें युग ‘प्लीओसीन’ से शुरू हुआ। इस युग में महाद्वीप और महासागर…
पृथ्वी- मानव का प्रारम्भिक इतिहास
मानव इतिहास का मूल स्रोत पृथ्वी है और जिसकी आयु के साथ मानव इतिहास निरन्तर प्रगतिशील होता जा रहा है। वैज्ञानिकों का मत है कि ‘‘हमारी पृथ्वी 4.6 अरब वर्ष पुरानी है।’’ लेकिन मानव इतिहास इतना प्राचीन नहीं है। जीव वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर एक क्रमिक विकास के तहत प्राणियों का विकास…