पाण्डुकेश्वर नामक स्थान उत्तराखण्ड के चमोली जनपद के अलकनंदा घाटी में स्थित गोविन्दघाट के निकट है। प्राचीन काल में हस्तिनापुर के राजा पाण्डु ने यहाँ तप किया था। इसलिए इस स्थान को पाण्डुकेश्वर कहा गया। राजा पाण्डु ने ऋर्षि किंडम के शाप से मुक्ति पाने हेतु यहाँ भगवान विष्णु का ध्यान और तप किया। इस…
पाण्डुकेश्वर ललितशूरदेव का ताम्रपत्र
पाण्डुकेश्वर गांव अलकनंदा के दायें तट पर स्थित है, जहाँ से कार्तिकेयपुर एवं सुभिक्षुपुर उद्घोष वाले ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। इसलिए इन ताम्रपत्रों को पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र भी कहते हैं। इन ताम्रपत्रों में कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव के दो ताम्रपत्र उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनमें से एक ताम्रपत्र 21 वें राज्य वर्ष…
उत्तराखण्ड का ऐतिहासिक कुणिन्द राजवंश
उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास से संबंधित एकमात्र ऐतिहासिक सामग्री कुणिन्द वंश की प्राप्त होती है, जिसे मुख्यतः दो भागों में विभाजित कर सकते हैं- पुरातात्विक एवं साहित्यिक सामग्री। पुरातात्विक सामग्री में कुणिन्द मुद्राएं और साहित्यिक सामग्री में धार्मिक ग्रंथ महत्वपूर्ण हैं। प्राचीन काल से तृतीय शताब्दी ईस्वी पूर्व तक कुणिन्द इतिहास का एक मात्र स्रोत्र…
कर्तृपुर राज्य में चन्द्रगुप्त
उत्तराखण्ड के प्राचीन कुणिन्द राजवंश का पतन तृतीय शताब्दी ई. के आस पास माना जाता है। चतुर्थ शताब्दी में कुणिन्द जनपद के स्थान पर प्रयाग स्तम्भ लेख में कर्तृपुर राज्य का उल्लेख किया गया है। ‘‘समुद्रगुप्त की प्रशस्ति में नेपाल के पश्चिम में स्थित कर्तृपुर का समीकरण कुमाऊँ-गढ़वाल के किया जाता है, जिसमें रुहेलखण्ड और…
पौरव वंश और ब्रह्मपुर स्थानीय शासन
ब्रह्मपुर नगर उद्घोष के साथ पर्वताकार राज्य में वर्म्मन (वर्म्मा) नामान्त वाले पांच पौरव शासकों ने राज्य किया, जिनका शासन काल छठी शताब्दी ई. के आस पास मान्य है। ये शासक राजा हर्ष के पूर्ववर्ती थे। वीरणेश्वर भगवान के आर्शीवाद से सोम-दिवाकर वंश (पौरव वंश) में क्रमशः विष्णुवर्म्मा, वृषणवर्म्मा, अग्निवर्म्मा, द्युतिवर्म्मा और विष्णुवर्म्मा द्वितीय…
पौरव वंश- प्राचीन ब्रह्मपुर का भूगोल
भारत का प्राचीन इतिहास बीसवीं शताब्दी से पहले जब लिखा गया तो, आर्य जाति के उदय और उत्थान तक सीमित था। आर्यों के मूल निवास को लेकर व्यापक परिचर्चा और शोध उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में प्राचीन भारतीय इतिहास का मुख्य विषय रहा था। आर्यों द्वारा रचित वैदिक ग्रंथों के आधार पर प्राचीन भारतीय इतिहास की घटनाओं…
ब्रह्मपुर के पौरव राज्य में भूमि पैमाइश
ब्रह्मपुर की पहचान पुरातत्व विभाग के प्रथम महानिदेशक अलेक्जैंडर कनिंघम ने पश्चिमी रामगंगा घाटी में स्थित चौखुटिया के निकटवर्ती क्षेत्र से की, जिसे उन्होंने लखनपुर-वैराटपट्टन कहा। लखनपुर-वैराटपट्टन रामगंगा घाटी के पृथक-पृथक पुरास्थल हैं, जहाँ अब कमशः लख्नेश्वरी और वैराठेश्वर मंदिर स्थापित है। इन दो स्थलों के मध्य लगभग 5 से 6 किलोमीटर की…
तालेश्वर ताम्रपत्र और ब्रह्मपुर का इतिहास
सातवीं शताब्दी के भारतीय इतिहास को देखें तो, उत्तर भारत पर कन्नौज के शक्तिशाली राजा हर्ष का शासन था। वह उत्तर भारत का सर्वमान्य राजा था। मध्य हिमालय का ब्रह्मपुर राज्य सातवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही हर्ष के अधीन आ चुका था। इस तथ्य की पुष्टि हर्ष का दरबारी कवि बाणभट्ट करता है,…
ब्रह्मपुर राज्य के पदाधिकारी
उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में मध्य हिमालय क्षेत्र के तीन राज्यों स्रुघ्न, गोविषाण और ब्रह्मपुर का विशेष उल्लेख किया गया है। स्रुघ्न की पहचान हरियाणा के अम्बाला और गोविषाण की पहचान उत्तराखण्ड के काशीपुर के रूप में हो चुकी है। अलेक्जैंडर कनिंघम ने लखनपुर वैराटपट्टन की पहचान ब्रह्मपुर से की। इसी लखनपुर वैराटपट्टन…
उत्तराखण्ड का प्राचीन राज्य ब्रह्मपुर
उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में मध्य हिमालय क्षेत्र के तीन राज्यों स्रुघ्न, गोविषाण और ब्रह्मपुर का विशेष उल्लेख किया गया है। चीनी यात्री ह्वैनसांग के यात्रा विवरण में भी इन तीन राज्यों का उल्लेख किया गया है। चीनी यात्री के यात्रा विवरणानुसार वह स्रुघ्न से मतिपुर, मतिपुर से ब्रह्मपुर तथा ब्रह्मपुर से गोविषाण गया…