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November 26, 2025December 9, 2025

अस्कोट के रजवार शासकों के ताम्रपत्र 

अस्कोट के रजवार शासकों के ताम्रपत्र कुमाऊँ के पृथक-पृथक स्थानों से प्राप्त हुए है, जो कुमाऊँ के सरयू पूर्व भू-भाग पर रजवारों द्वारा शासित क्षेत्र के राजनैतिक भूगोल को निर्धारित करने में सहायक हैं। तेरहवीं शताब्दी के अंतिम पड़ाव में कुमाऊँ का सरयू पूर्व क्षेत्र सीरा, सोर और गंगोली राज्य में विभाजित हो चुका था। सीरा राज्य में कत्यूरियों की एक शाखा अस्कोट-पाल वंश का शासन सन् 1279 में अभयपाल के नेतृत्व में आरंभ हुआ था। प्रकाशित अस्कोट-पाल वंशावली के अनुक्रम में अभयपाल के पश्चात क्रमशः निर्भयपाल, भारतीपाल, भैरवपाल और भूपाल राजा हुए थे। भूपाल के पश्चात पाल वंशावली में 26 राजाओं के नाम ज्ञात नहीं हैं। चौदहवीं शताब्दी में अस्कोट-पाल वंश ने संभवतः कत्यूरियों की एक अन्य शाखा डोटी-मल्ल की अधीनस्थ स्वीकार कर ली थी। मल्ल राजाओं ने अस्कोट के उत्तर-पश्चिम में स्थित सीराकोट में डोटी राज्य की पश्चिमी राजधानी स्थापित की, जिसका पतन सन् 1581 ई. में हुआ था। 

डोटी राज्य का संस्थापक नागमल्ल था, जो अस्कोट-पाल वंश के संस्थापक अभयपाल के भ्राता निरंजनदेव के पुत्र थे। ‘‘नागमल्ल के दो पुत्रों में से बड़े पुत्र शमशेरमल्ल के वंशज मल्ल, छोटे पुत्र अर्जुनसाही के वंशज साही कहलाये।’’ नागमल्ल का प्रसिद्ध मंदिर गंगोली के डाँगीगांव में है। कालान्तर में मल्लों की एक शाखा सोरघाटी (पिथौरागढ़) में स्थापित हुई और सोर के बम कहलाये। पन्द्रहवीं शताब्दी में सोर के शासक विजयब्रह््म या विजयबम थे, जो चंपावत के चंद राजा ग्यान गरुड़ चंद के अधीनस्थ थे। प्रकाशित शाके 1344 का ग्यानचंद और विजयब्रह्म का सेलौनी ताम्रपत्र इस तथ्य की पुष्टि करता है। सोर पर कभी दक्षिणी सीमावर्ती चंद तथा कभी उत्तरी सीमावर्ती सीरा के मल्ल राजाओं का अधिकार रहा था। सीरा के अंतिम मल्ल राजा हरिमल्ल, सीराकोट युद्ध (1581 ई.) में चंद राजा रुद्रचंद (1568-1597) से पराजित हुए और अपने प्राण बचाकर डोटी भाग गये थे।

        सरयू पूर्व क्षेत्र में सीरा और सोर के अतिरिक्त गंगोली भी एक प्राचीन राज्य था, जिसके बाजार (हाट) को अब गंगोलीहाट कहा जाता है, जो पिथौरागढ़ जनपद की एक तहसील है। गंगोलीहाट में कालिका का प्राचीन शक्तिपीठ है, जिसे हाट कालिका कहते हैं। नौवीं शताब्दी में इस शक्तिपीठ की स्थापना आदिगुरु शंकाराचार्य ने की थी। नौवीं से बारहवीं शताब्दी तक सरयू-पूर्वी रामगंगा अंतस्थ क्षेत्र या गंगोली क्षेत्र शक्तिशाली कत्यूरी राज्य का अभिन्न अंग रहा था। तेरहवीं शताब्दी में गंगोली राज्य का उदय कत्यूरी राज्य के विभाजन के फलस्वरूप हुआ था। गंगोली राज्य के प्रथम राजा रामचंद्रदेव थे, जिन्हें उत्तर कत्यूरी कहा जाता है। इस राजा ने गंगोलीहाट के निकट राममंदिर समूह और जाह्नवी नौला का निर्माण करवाया था। यह नौला कुमाउनी और स्थानीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसके वाह्य प्राचीर में रामचंद्रदेव का एक प्रस्तर अभिलेख स्थापित है। इस अभिलेख में सन् 1264 और 1275 ई. की तिथि शाके में उत्कीर्ण है।

        रामचन्द्रदेव के वंशजों ने गंगोली पर लगभग 80 वर्ष शासन किया था। गंगोली के अंतिम उत्तर कत्यूरी शासक धारलदेव थे, जिनकी हत्या मणकोटी कर्मचंद ने कर दी थी। गंगोलीहाट के निकट मणकोट नामक प्राकृतिक दुर्ग से संचालित गंगोली राज्य में नेपाल के चंदवंशीय आठ शासकों ने लगभग दो शताब्दियों तक राज्य किया, जिन्हें मणकोटी कहा जाता है। अंतिम मणकोटी राजा नारायणचंद को चंद राजा कल्याणचंददेव (1545-1568) ने पराजित कर, गंगोली को चंद राज्य में सम्मिलित कर लिया था। सन् 1581 ई. में कुमाऊँ के सबसे दूर्भेद्य दुर्ग सीराकोट को विजित करने में गंगोली की भूमिका महत्वपूर्ण थी, जहाँ के पुरुष पंत के नेतृत्व में चंद सेना सीराकोट सहित सम्पूर्ण सीरा राज्य को विजित करने में सफल हुई थी। रुद्रचंद ने इस महान विजय के साथ सरयू पूर्व के गंगोली, सीरा और सोर राज्य का शासन अस्कोट-पाल वंश के रायपाल को सौंप दिया था, जो अपने वंशानुक्रम में 94 वें राजा थे।

        सन् 1588 ई. में रायपाल की हत्या ओझा ब्राह्मण ने कर दी और उस समय उसका पुत्र और उत्तराधिकारी महेन्द्रपाल नवजात बालक था। अतः राजपरिवार के कल्याणपाल रजवार को उसका संरक्षक नियुक्त किया गया और साथ ही सरयू पूर्व के शासन को अस्कोट राजपरिवार के सदस्यों में विभाजित कर दिया गया। इस विभाजन के फलस्वरूप गंगोली सहित सरयू पूर्व क्षेत्र में रजवार शासन आरंभ हुआ, जिसकी पुष्टि गंगोली से प्राप्त रजवार नामान्त शासकों के ताम्रपत्र करते हैं।

गंगोली के बड़ाऊँ (बेरीनाग) और अठिगांव (गणाई-गंगोली) से क्रमशः राजाधिराज आनन्दचंद रजवार और पृथ्वीचंद रजवार का एक-एक ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है। आनन्दचंद के किरौली ताम्रपत्र में शाके 1519 (सन् 1597 ई.) तिथि उत्कीर्ण है, जो कुछ वर्ष पूर्व सन् 1999 ई. में प्रकाश में आया। विद्वानों ने इस ताम्रपत्र को मणकोटी वंश से संबद्ध किया। वस्तुतः रजवार नामान्त वाले शासकों का संबंध अस्कोट-पाल वंश से था, जो कत्यूरियों की एक शाखा से थे। पृथ्वीचंद रजवार के गणाई ताम्रपत्र में दो तिथियां शाके 1528 और शाके 1532 अंकित है, जिनके आधार पर पृथ्वीचंद रजवार के शासन काल को सन् 1606 ई. से सन् 1610 ई. तक तो अवश्य निर्धारित कर सकते हैं। इसी प्रकार आनन्दचंद के शासनकाल को सन् 1597 से 1606 ई. तक मान्य कर सकते हैं। 

        आनन्दचंद और पृथ्वीचंद रजवार के अतिरिक्त कल्याणपाल रजवार का एक ताम्रपत्र सन् 1603 ई. का पिथौरागढ़ के भेटागांव से प्राप्त हो चुका है। सन् 1597 से 1606 ई. तक कुल 9 वर्षों में निर्गत तीन रजवार शासकों के ताम्रपत्र इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि सरयू पूर्व का कुमाऊँ राज्य अस्कोट-पाल राजपरिवार में विभाजित था।

रजवार शासकों के प्रकाशित ताम्रपत्र-

1- किरौली ताम्रपत्र।

2- भेटा ताम्रपत्र।

3- अठिगांव या गणाई-गंगोली ताम्रपत्र।

रजवार शासकों के उक्त प्रकाशित ताम्रपत्रों के अतिरिक्त इन्द्र रजवार और महेन्द्रपाल का एक-एक ताम्रपत्र प्रकाश में चुका है। इन्द्र रजवार का सन् 1594 ई. का ताम्रपत्र बागेश्वर के चामी गांव तथा महेन्द्रपाल का सन् 1622 ई. का ताम्रपत्र अठिगांव से प्राप्त हुआ है। अतः गंगोली में रायपाल के मृत्यूपरांत, जो रजवार शासन आरम्भ हुआ, प्रथम रजवार शासक इन्द्र रजवार तथा अंतिम शासक महेन्द्रपाल थे। महेन्द्रपाल अस्कोट-पाल वंशावली के अनुक्रम में 95 वें राजा थे। 

1- किरौली ताम्रपत्र का पंक्तिबद्ध पाठ-

                श्री शाके 1519 मासानि वैशाख 7 गते

                सोमवासो श्री राजाधिराज आनन्द चन्द रज्वार ज्यू बड़ा-

                 -उ माज केराउलि गाउ केशव पंत दीनु केशव पंत ले पाया

                 द..कै दिनु देउल पुज कि पाठि कै पायो केराउलि गाउ

                लागदि गाउ बगड़ि लेक इजरि रौत कै पायो सर्वकर अक-

                 -रो सर्वदोष निर्दोष के यो साक्षि नराइण गुशाई पिरु गु-

                 -शाई खड़कु गुशाई चार चौधरिक पुरु बिष्ट शालि-

                 -वाण वाफिलो केद कार्की सुर्त्ताण कार्की ’’शुभम्’’

                 भूमि यः प्रतिगृहणाति यश्च भूमि प्रयछति।

                  उभौ तौ पुण्य कर्माणौ नियतं स्वर्गा गानिनौ।।

  राज्य चिह्न के नीचे और ताम्रपत्र के बायें पार्श्व में उत्कीर्ण पंक्ति- 

                  लिखिते वैकुण्ठ पंडितेन।।

सारांश- 

        यह ताम्रपत्र 21 अप्रैल सन् 1597 ई. को सोमवार के दिन निर्गत किया गया था, जिसे आनन्द रजवार ने किरौली और लगदि गांव को रौत में केशवपंत को देने हेतु निर्गत किया था। किरौली गांव बेरीनाग तथा लग गांव थल तहसील का एक राजस्व ग्राम है। केशवपंत ने यह ताम्रपत्र स्थानीय नाग देवताओं पिंगलीनाग और कालीनाग की पूजा-पाठ हेतु प्राप्त किया था। इस ताम्रपत्र के साक्षियों में चंद राजा रुद्रचंद के पौत्र नारायणचंद के अतिरिक्त स्थानीय चार चौधरियों कार्की, बाफिला और बिष्ट का भी उल्लेख किया गया है। वर्तमान में भी किरौली गांव के निकटवर्ती गांवों में कार्की, बाफिला और बिष्ट जातियों के लोग निवास करते हैं।

2- भेटा कालापानी ताम्रपत्र का पंक्तिबद्ध पाठ- 

                 ददत- 3 दशरथ 3 पाये

         श्री राजा लक्षमणचन्द्रेण संकल्पपूर्वकं ।। महानंदाय भि

          षजे ग्रामो दोलक संग्यकः। किर्त्येन्दु वासह कल्याणपाल पूर्वे

         पि दत्तः (जेहुतः) । महानंदाय भिषजे तनभूयो कल्याणपालोपि श्री कल्याण

         पाल रज्वार महेन्द्रपाल कवूर (कुंवर) सपरि आवार चिरं जयतू।। श्री रज्वार पा

         य ले दउलो दत्त करि दिनु महानंद वैद्य ले पायो सर्वकर अकर अक

         र अकर सर्वदोष विसुध करि पायो भात बाकरो तोडि पायो भाठ बुडो

         रौल्या देउल्य बजन्या बखर्या घोडालो कुकुरालो तोडि पायो सुंद

         र पाल। भैरो पाडे लै जसि सेवा करि तसि सेवा कर्नि उसोइ भौडया

         ल कि दिलशा कनि (कर्नि)। साक्षी धरति धर्मराजा चंद्र सूर्यात साक्षि म 

         नि गुसाइ चतरु गुसा भोगि गुसाइ बासु पंज्यु नरि ऊझा साल

         दिगारि कुमेर भाट महराज पोखरया राम उपरेति कल्याणपाल

         रज्वार की संतति लै भुचाउनि माहनद कि संतति लै खानु

         श्री शाके 1525 समये वैशाख सुदि त्रयोदस्या तिथौ बुध वा

         सरे हस्तनक्षत्रे लिखित साक्षि संभुजोइसि।। कडारी-

         तं राम सुनार सुभ मस्तु।

सारांश- 

        यह ताम्रपत्र पिथौरागढ़ के खड़ायत पट्टी के भेटा-भौड़ा गांव से प्राप्त हुआ, जिसे हस्त नक्षत्र और बुधवार 23 अप्रैल, 1603 ई. को प्रदोष व्रत के दिन निर्गत किया गया था। यह ताम्रपत्र चंद राजा लक्ष्मीचंद (1597-1621) और अस्कोट राजपरिवार के कल्याणपाल रजवार का एक संयुक्त ताम्रपत्र है, जिसे महानंद वैद्य को निर्गत किया गया था। इस ताम्रपत्र में चंद कालीन करों भात बाकरो (चावल-बकरा भोज), बजन्या (संगीतकार), बखरया (गायक), घोडालो (घोड़ों के लिए) और कुकुरालो (कुत्तों के लिए) आदि का उल्लेख किया गया है। इस ताम्रपत्र साक्षियों में चंद राजपरिवार के गुसाई नामान्त वाले सदस्यों के अतिरिक्त चंद राजा लक्ष्मीचंद के प्रधान और गंगोली के वासु पंत का उल्लेख किया गया है। इस ताम्रपत्र में दक्षिण-पूर्वी अस्कोट क्षेत्र में निवास करने वाले क्षत्रियों दिगारी और पोखरिया का उल्लेख स्थानीय इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।        

3- गणाई-गंगोली ताम्रपत्र का पंक्तिबद्ध पाठ –

                ओम् श्री शाके 1532 मासे मार्गशिर शुदि द्वितीया बुधे (।) 

                श्री राजाधिराज पृथ्वीचन्द्र रजवार पाय ले मया चितो इ विशु उपाध्या 

                अठिगाउ माज अधालि 1 तमोटा कि हुनि (।) दिनि(।)

                सर्वकर अकरि सर्वदोष निदोषी कै गणाई तिपई (।) 

                उइ अधालि लगनि गाउ की बगड़ी लेक की इजर कै पाई (।) 

                तथा शार्दूल गुसाई सुपाय ले दिनि।

                पिपल मुडतलाऊं तिरछि जदत करि पाई (।)

                शाकि चार चौधरिक, मुरु गुशाइ संग्राम राउत षिउराज मतोषु लुमन (।) 

                लिखितं विशोनाथ पंडितेन (।) शुभ मस्तु (।) 

                पृथ्वीचन्द्र रजवार ले दिनि वलिक….. ले पाई अधालि (।)

                शीर्ष पर पृथ्वीचन्द्र जयश्री 1528 (।) शाके महेश पादौ (।) 

सारांश- 

        यह ताम्रपत्र 17 नवम्बर, सन् 1610 को बुधवार और ज्येष्ठा नक्षत्र में निर्गत किया गया था, जिसे अस्कोट राजपरिवार के पृथ्वीचंद रजवार ने विशु उपाध्याय को निर्गत किया था। इस ताम्रपत्र में उल्लेखित तमोटा शब्द को विद्वान ताम्र धातु के बर्तन बनाने वाली स्थानीय टम्टा जाति से संबद्ध करते हैं। इस ताम्रपत्र के साक्षियों में चार चौधरियों में संग्राम रावत का नाम ही स्पष्ट हो पाया है। अठिगांव या गणाई गंगोली के निकटवर्ती बांस-पटान और रावतसेरा में रावत क्षत्रिय निवास करते हैं।

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