बालो कल्याणचंददेव द्वारा निर्गत भेटा ताम्रपत्र (शाके 1467) में उनकी उपाधि महाराजाधिराज उत्कीर्ण है। अर्थात बालो कल्याणचंददेव 31 मई, सन् 1545 ई. को महाराजाधिराज की उपाधि के साथ चंद राजसिंहासन पर आसित हो चुके थे। इस ताम्रपत्रानुसार- ’‘महाराजाधिराज स्री कल्यानचंद्र देव ले संकल्पपूर्वक जीर्णो धार करि राजा भीष्मचंद की दिनी।’’ इस ताम्रपत्र में भीष्मचंद का उल्लेख और कल्याणचंददेव की महाराजाधिराज की उपाधि से स्पष्ट होता है कि सन् 1545 ई. में भीष्मचंद की मृत्यु हो चुकी थी।
👉पिता भीष्मचंद की हत्या-
इस संबंध में एक रोचक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख पंडित बद्रीदत्त पाण्डे इस प्रकार से करते है-
’’गागर के पास रामगाड़ में श्रीगजुवाठिंगा नाम का एक खस जाति का सरदार था, जो अर्द्ध-स्वतंत्र नृपति अपने को कहता था। वह राजा कीर्तिचंद की चढ़ाई के समय दबाये जाने से बच गया था। उसने बहुत-सी सेना एकत्र कर खगमराकोट (अल्मोड़ा) पर चढ़ाई की और जब राजा भीष्मचंद किले में सो रहे थे, खस राजा श्रीगजुवाठिंगा ने रात को चुपके से वहां जाकर बूढ़े चंद राजा का सिर काट डाला, और उनके बहुत से सोते साथियों को भी मार डाला और उसने अपने को बारामंडल का राजा भी बना लिया, पर उसका स्वतंत्रता का स्वप्न बहुत दिनों तक स्थिर न रहा। ज्यों ही यह खबर काली-कुमाऊँ में पहुँची, बालो कल्याणचंद ने डोटियालों के साथ तो सुलह कर दी और अपने पिता की मृत्यु का जोरदार बदला लिया। सबको कत्ल किया। गजुवाठिंगा भी मारे गये। यह घटना 1560 में हुई।’’
चंद काल में पर्वतीय भूभाग पर अधिकांश सैन्य अभियान ग्रीष्म ऋतु में चलाये जाते थे। 31 मई, सन् 1545 को भेटा ताम्रपत्र निर्गत किया गया था। अतः मई,1545 ई.में राजा भीष्म चंद की हत्या हो चुकी थी। रामगढ़, नैनीताल जनपद के गागर पर्वत के आस पास का क्षेत्र है, जहाँ से अल्मोड़ा लगभग 50 किलोमीटर के दूरी पर है। कीर्तिचंद चंद सन् 1505 ई. तक चंद शासक थे, जिन्होंने राज्य विस्तार हेतु पश्चिमी कत्यूरी राज्यों पर सैन्य अभियान चलाया था। ‘‘कीर्तिचंद के समय में कत्यूर, दानुपर, अस्कोट, सीरा, सोर को छोड़कर सारा कुमाऊँ उनके हाथ आ गया था।’’ ‘खगमराकोट’ अल्मोड़ा में स्थित पश्चिमी कत्यूरियों का एक दुर्ग था, जो भीष्मचंद की विजय और हत्या का साक्षी रहा था।
चंद शासन काल में समय-समय खस राजाओं ने विद्रोह किया और उनमें से गजुवाठिंगा भी एक थे। अल्मोड़ा के आस पास के क्षेत्र को बारामण्डल तथा चम्पावत क्षेत्र को काली-कुमाऊँ कहा जाता था। भीष्मचंद के उत्तराधिकारी बालो कल्याणचंद ने मध्य हिमालय में अपनी स्थिति सुदृढ़ करने हेतु परम्परागत प्रतिद्वंद्वी डोटी-मल्ल राज्य (डोटीयाल राज्य) से समझौता किया। डोटियालों की सहायता से सन् 1560 ई. में कल्याणचंद ने गजुवाठिंगा को पराजित कर अल्मोड़ा पर अधिकार कर लिया था।
👉पैत्रिक राज्य और चुनौतियां-
बालो कल्याणचंददेव ने 31 मई, सन् 1545 ई. में दशहरा पर्व पर भेटा ताम्रपत्र नरि पाण्डे नामक ब्राह्मण को निर्गत किया था और महाराजाधिराज उपाधि धारण की थी। यह ताम्रपत्र सोर पर चंद राज्य के अधिकार की पुष्टि करता है। शासन के आरंभिक चरण में इस चंद राजा को जो पैत्रिक राज्य प्राप्त हुआ, उसमें सोर के अतिरिक्त काली-कुमाऊँ से बारामण्डल की सीमावर्ती तक का भू-भाग सम्मिलित था। इस राजा के सामने सोर के उत्तर में डोटियाल और पश्चिम में खस राजा गजुवाठिंगा की चुनौती थी। इन दोनों मोर्चे में इतना अंतर अवश्य था कि डोटियाल निरन्तर चंद राज्य पर आक्रमण कर रहे थे, तो वहीं बालो कल्याणचंद को अपने पिता का प्रतिशोध लेने हेतु अल्मोड़ा पर आक्रमण करना था।
अतः इस चंद राजा को सर्वप्रथम डोटियालों के आक्रमण से अपने राज्य को सुरक्षित करना था। इस समस्या का समाधान हेतु बालो कल्याणचंददेव ने डोटियालों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किया। पंडित बद्रीदत्त पाण्डे लिखते हैं- ‘‘राजा बालो कल्याणचंद की रानी डोटी के रैका राजा की पुत्री थी और वहां के रैका राजा हरिमल्ल की बहिन थी।’’
डोटियालों से अपने राज्य को सुरक्षित करने के पश्चात बालो कल्याणचंददेव ने पश्चिमी सैन्य अभियान चलाया। सर्वप्रथम गजुवाठिंगा से पिता की हत्या का प्रतिशोध लिया और अल्मोड़ा पुनः चंदों के अधिकार में आ गया। इसके पश्चात इस प्रतापी राजा ने गंगोली राज्य को चंद राज्य में सम्मिलित कर लिया। इस शासनावधि में उसके शासन की प्रमुख विशेषता थी- पुराने राज्य पदाधिकारियों को महत्व देना और नवीन राज्य पदों की स्थापना करना था।
पंत ब्राहमणों का चंदों की सेवा में आना-
सन् 1560 ई. का जाखपंत ताम्रपत्र कुमाऊँ में चंद राज्य विस्तार की ओर संकेत करता है। यह ताम्रपत्र 14 अप्रैल, 1560 को रामनवमी पर्व पर अपराह्न 2.37 बजे के उपरांत निर्गत किया गया था। यह ताम्रपत्र बालो कल्याणचंददेव द्वारा भूमि दान हेतु मनीपंत को पिथौरागढ़ के निकटवर्ती जाख गांव को दिया। यह ताम्रपत्र गंगोली पर चंद राज्य के अधिकार की पुष्टि करता है। प्रकाशित सैकड़ों चंद ताम्रपत्रों में यह ताम्रपत्र पहला है, जो चंद राजाओं द्वारा किसी पंत ब्राह्मण को निर्गत किया गया। पंतों का मूल निवास कुमाऊँ में गंगोली मान्य है।
ऐतिहासिक मतानुसार चौदहवीं शताब्दी में पंतों के मूल पुरुष कोंकण (महाराष्ट्र) से गंगोली आये थे। गंगोली (मणकोटी राज्य) में उप्रेतियों की बगावत से दीवान, पौराणिक, वैद्य व राजगुरु के राज्य पद पंतों को प्राप्त हुए थे। मणकोटी राजाओं ने गंगोली में लगभग 200 वर्ष शासन किया। इस अवधि में आठ राजाओं ने गंगोली पर शासन किया।
कालान्तर में अंतिम मणकोटी राजा नारायणचंद के कुशासन से दुःखी होकर पंतों ने चंद राजा बालो कल्याणचंद को गंगोली विजित करने हेतु प्रत्यक्ष सहायता प्रदान की। इस चंद राजा ने भी उन्हें पुरस्कृत करते हुए सोर के जाख गांव में भूमि दान दिया। इस ताम्रपत्र में उल्लेखित जाख गांव को अब जाखपंत नाम से जाना जाता है, जो वर्तमान पिथौरागढ़ नगर का निकटवर्ती गांव है। सन् 1560 ई. का वर्ष चंद राज्य विस्तार हेतु सबसे महत्वपूर्ण वर्ष था, जब अल्मोड़ा और गंगोली पर बालो कल्याणचंददेव अधिकार करने में सफल हुए थे।

जाखपंत ताम्रपत्र की चौथी पंक्ति- ‘‘दीनी जाख कनारी सुद्धा मनी पन्त संगज्यालले पाइ’’ में संगज्याल शब्द चंद राजा और मनीपंत के आपसी संबंधों पर प्रकाश डालता है। जबकि डॉ. रामसिंह लिखते हैं- ‘‘संगज्याल का अभिप्राय स्पष्ट नहीं है।’’ गंगोली की कुमाउनी में आज भी मित्र हेतु संगज्यू नामक शब्द प्रयुक्त किया जाता है। संस्कृत शब्द ‘संग’ (मिलन या अनुराग) और ज्यू (सम्मान हेतु प्रयुक्त शब्द) के सुमेल से संगज्यू और संगज्यू से ही संगज्याल शब्द की व्युत्पत्ति हुई।
अतः गंगोली के पंत ब्राह्मण मनीपंत से बालो कल्याणचंद ने मित्रवत् संबंध स्थापित करने के साथ-साथ भूमि दान देकर सम्मानित किया। इस मित्रता की नींव मणकोटी राज्य की दीवारें ढहने पर रखीं गयीं थीं। अतः जाखपंत ताम्रपत्र गंगोली पर चंद राज्य के अधिकार की पुष्टि के साथ चंद-पंत गठजोड़ का प्रथम ऐतिहासिक प्रमाण पत्र है।