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November 24, 2025December 10, 2025

पाण्डुकेश्वर ललितशूरदेव का ताम्रपत्र

    पाण्डुकेश्वर गांव अलकनंदा के दायें तट पर स्थित है, जहाँ से कार्तिकेयपुर एवं सुभिक्षुपुर उद्घोष वाले ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। इसलिए इन ताम्रपत्रों को पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र भी कहते हैं। इन ताम्रपत्रों में कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव के दो ताम्रपत्र उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हैं। इनमें से एक ताम्रपत्र 21 वें राज्य वर्ष का है, जिसे स्थानीय लोग भीम की पाटी कहते थे। इस तामपत्र का आकार काष्ठ से निर्मत स्लेट (पाटी) जैसा ही है, जिसके मुट्ठे पर ‘नंदी’ का अंकित चित्र कार्तिकेयपुर के राज्य-चिह्न को प्रदर्शित करता है। 

    पाण्डुकेश्वर से ललितशूरदेव के अतिरिक्त पद्मटदेव का कार्तिकेयपुर तथा सुभिक्षराजदेव का सुभिक्षुपुर उद्घोष वाला एक-एक ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है, जो भिन्न-भिन्न राजधानी नगर की ओर संकेत करता है। इन तीन शासकों को इतिहासकार उत्तराखण्ड के प्राचीन राजवंश ‘कत्यूरी’ से संबद्ध करते हैं। इन कार्तिकेयपुर नरेशों में ’ललितशूरदेव’ को कत्यूरी राजवंश का प्रतापी शासक माना जाता है, जिसके ताम्रपत्र कार्तिकेयपुर नामक विषय से निर्गत किये गये थे। प्रकाशित ताम्रपत्रों के अनुसार इस महान कत्यूरी शासक की वंशावली ’निम्बर’ से आरंभ हुई। ताम्रपत्रां के अतिरिक्त बागेश्वर शिलालेख भी ललितशूरदेव की वंशावली की पुष्टि करता है, जिसे उसके पुत्र भूदेवदेव ने लिखवाया था। 

21 वें राज्य वर्ष का पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र

    ललितशूरदेव के राज्य वर्ष 21 को निर्गत ताम्रपत्र में कुल 30 पंक्तियां हैं। प्रथम पंक्ति में कार्तिकेयपुर, तृतीय पंक्ति में शिव का नाम धूर्ज्जटेः तथा चतुर्थ पंक्ति में कुल देवी भगवती नंदा के साथ कुल पुरुष ‘निम्बर’ का उल्लेख किया गया है। पांचवीं पंक्ति में निम्बर की रानी नाथूदेवी और उनसे उत्पन्न पुत्र ‘इष्टगणदेव’ का उल्लेख परम महेश्वर एवं परमब्राह्मण्य उपाधि सहित किया गया है। छठी पंक्ति में परम भट्टारक महाराजाधिराज और परमेश्वर उपाधि के राजा इष्टगणदेव का उल्लेख उनकी महारानी वेग देवी के साथ किया गया है। सातवीं, आठवीं और नौवीं पंक्ति में इष्टगणदेव और उनकी महारानी वेगदेवी से उत्पन्न पुत्र की प्रशंसा की गई है। दशवीं पंक्ति में परम भट्टारक, महाराजाधिराज और परमेश्वर उपाधि के साथ ललितशूरदेव का उल्लेख किया गया है। इस पंक्ति कार्तिकेयपुर को ‘विषय’ कहा गया है। ‘विषय’ को जनपद के अर्थ में लिया जाता है। प्राचीन काल में छोटे राज्य को जनपद और बड़े राज्य को महाजनपद कहा जाता था। 

    ईक्कीसवें राज्य वर्ष वाले कार्तिकेयपुर ताम्रपत्र कि ग्यारहवीं पंक्ति में राजा-पुत्र के साथ राज्य पदाधिकारियों- अमात्य, सामन्त, महासामन्त, ठक्कुर, महामनुष्य, महाकर्तृकृतिक, महाप्रतीहार, महादण्डनायक और महाराज प्रमातार का उल्लेख किया गया है। कार्तिकेयपुर विषय में राज पुत्रों के पश्चात अमात्य (सलहाकार ब्राह्मण) उच्च पदाधिकारी था। समान्त और महासामन्त छोटे-छोटे अधीनस्थ राजा तथा ठक्कुर और महामनुष्य संभवतः विशिष्ठ वर्ग के क्षत्रिय थे। महाकर्तृ कृतिक संभवतः कर्तृपुर का अधिकारी, जिसका उल्लेख समुद्र गुप्त के प्रयाग प्रशस्ति पत्र में नेपाल के पश्चिम में स्थित सीमान्त राज्य हेतु किया गया है। प्रतिहार अन्तःपुर का रक्षक एवं महाप्रतिहार राजमहल के रक्षकों का प्रधान होता था। प्रतिहार और महाप्रतिहार गुप्तकाल में केन्द्रीय अधिकारी थे। महादण्डनायक संभवतः सैन्य और महाराज प्रमातार भूमि पैमाइश करने वाला राज्य पदाधिकारी था।

    बारहवीं पंक्ति में राज्य पदाधिकारियों- कुमारामात्य, उपरिक, दुस्याध्यासाधनिक, दशापराधिक, चौरोद्धरणिक, शौल्किक, शौल्मिक, तदायुक्तक, विनियुक्तक, पट्टाक, आपचारिक, अशेषभंग, अधिकृत हस्ति-अश्व-उष्ट्र का उल्लेख किया गया है। कुमारामात्य संभवतः अमात्य का सहायक या राजपुत्रों को शिक्षित करने वाला राज्याधिकारी था। गुप्तकाल में ‘विषय’ के अधिकारी को ‘उपरिक’ कहते थे। दुस्याध्या साधनिक दुष्टों को साधाने, दशापराधिक दश प्रकार के अपराधों और चौरोद्धरणिक संभवतः चोरों से निपटने वाले राज्याधिकारी था। शौल्किक शब्द ‘शुल्क’ में ‘इक’ प्रत्यय लगाने से बनता है। अतः शुल्क संग्रह करने वाला राज्याधिकारी शौल्किक था। शौल्मिक शब्द को ए.टी. एटकिंसन ‘गौल्मिक’ पढ़ते हैं, जिसकी व्युत्पत्ति ‘गुल्म’ में ‘इक’ प्रत्यय लगाने से होती है। ‘गुल्म’ संस्कृत का पुल्लिंग शब्द है, जिसका अर्थ सेना का एक विभाग होता था, जिसमें 9 हाथी, 9 रथ, 27 घोड़े और 45 पैदल सैनिक होते थे। ‘तदायुक्तक’ एक अधीनस्थ अधकारी था। विनियुक्तक व्यापार से संबंधित तथा हस्ति, अश्व और ऊँट सेना के अधिकारी भी कार्तिकेयपुर राज्य में थे। 

    तेरहवीं पंक्ति में ‘पति’ शब्दांत वाले राज्याधिकारियों का भी उल्लेख किया गया है, जिनमें विषयपति, भोगपति, नरपति और अश्वपति आदि मुख्य थे। जबकि चौदहवीं पंक्ति में ‘पाल’ शब्दांत वाले राज्याधिकारियों का उल्लेख है, जिनमें वर्त्मपाल, कौट्टपाल, घट्टपाल, क्षेत्रपाल, प्रान्तपाल आदि थे। पति का अर्थ ‘स्वामी’ और पाल का अर्थ ‘रक्षा करने वाला’ होता है। अतः विषयपति, भोगपत, नरपति, अश्वपति को क्रमशः जनपद, देवता हेतु चढ़ावा, पुरुष और घोड़ों की व्यवस्था करने वाला अधिकारी कह सकते हैं। जबकि वर्त्मपाल, कौट्टपाल, घट्टपाल, क्षेत्रपाल, प्रान्तपाल को क्रमशः मार्ग, कोट (दुर्ग), घराट, क्षेत्र और सीमा की रक्षा करने वाला राज्याधिकारी कह सकते हैं। पर्वतीय जन-जीवन में मार्ग, कोट और घराट का अत्यधिक महत्व था।

    तेरहवीं-चौदहवीं पंक्ति में पति और पाल नामांत वाले राज्याधिकारियों के अतिरिक्त बलव्यापृतक, भूतप्रेषणिक, दण्डिक, दण्ड-पाशिक, गमा-गमि शार्गिंक, अभित्वर, माणक, राजस्थानीय, किशोरवरवा, गो, महिष्यधिकृत, भट्ट महत्तम् अभीर, वणिक्, श्रेष्ठि, पुरोगास्त जैसे राज्याधिकारियों का उल्लेख किया गया है। वणिक और श्रेष्ठि का संबंध व्यापार से तथा किशोरवरवा, गो, महिष्यधिकृत, अभीर का संबंध पशुपालन से था। 

    पन्द्रहवीं पंक्ति में वनों में निवास करने वाली 18 भारतीय जातियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें ् खष, किरात, द्रविड़, कलिंग, शौर, हूण, उण्ड्र, मेद, आन्ध्र और चाण्डाल आदि महत्वपूर्ण थे। खस और किरातों का संबंध मध्य हिमालय से है, जिनका उल्लेख महाभारत से भी प्राप्त होता है। शौर-हूण का संबंध हिमालय क्षेत्र में निवास करने वाली जनजातियों से है, जिन्हें शौका और हुणिया कहा जाता है। द्रविड़ और आन्ध्र जातियों का संबंध दक्षिण भारत की जनजातियों से है। 

    सोलहवें पंक्ति में उत्तराखण्ड के प्राचीन गोरुन्नसायां नामक विषय तथा स्थानीय जातिगत शब्द खषियाक का उल्लेख किया गया है। सत्रहवीं पंक्ति में परिभुज्यमान पल्लिका का दो बार उल्लेख है। पल्लिका का शाब्दिक अर्थ ‘लघु ग्राम’ होता है। अठारहवीं पंक्ति में लोक-परलोक तथा उन्नीसवीं पंक्ति में उत्तरायण संक्रांति के साथ-साथ गंध, धूप, पुष्प, दीप, उपलेपन, नैवेद्य, नृत्य, गायन और वाद्य का उल्लेख किया गया।

    बीसवीं पंक्ति गोरुन्नसायां पल्लिका नामक स्थान को कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव की रानी सामदेवी द्वारा श्रीनारायण भट्टारक को दान देने से संबंधित है। ईक्कीसवीं पंक्ति काव्यात्मक है, जिसमें चाट-भाट (सेवक), चन्द्र-अर्क (सूर्य) और सीमागोचर (सीमावर्ती देश या चरागाह) का उल्लेख किया गया है। बाईसवीं पंक्ति में ब्राह्मण को दान में दी गई संपत्ति के उपयोग हेतु ‘भुज्यमान’ शब्द का उल्लेख किया गया है। चंद कालीन ताम्रपत्रों में भुज्यमान के स्थान पर कुमाउनी में ’भुचाउणि’ या ’भुचणि’  का प्रयोग किया गया था। 

    तेईसवीं पंक्ति में ताम्रपत्र को निर्गत करने के समय को इस प्रकार से अंकित किया गया है- ‘‘अदिति प्रवर्द्धमान विजय राज्य सम्बत्सर एकविशंतिमे सम्वत् 21 माघ वदि 3।’’ अर्थात इस ताम्रपत्र को कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव ने अपने राज्य के 21 वें वर्ष के माघ माह के कृष्णपक्ष की तृतीय तिथि को निर्गत किया था। इस पंक्ति में दान विभागाध्यक्ष (महादानाक्षयपटलाधिकृत) श्री पीजक का नाम भी उत्कीर्ण है।

    चौबसवीं पंक्ति के अर्द्धांश में ताम्रपत्र लिखने और टंकण करने वाले का नाम उत्कीर्ण है। इस ताम्रपत्र को श्री अयटाववना ने लिखा था, जो कार्तिकेयपुर विषय में ‘‘महासन्धिविग्रहाक्षपटलाधिकृत’’ के पद पर नियुक्त थे। जबकि टंकण का कार्य श्रीगंगभद्रेण ने किया था। चौबीसवीं पंक्ति के अर्द्ध्र-शेषांश से अंतिम तीसवीं पंक्ति तक कुल अठारह श्लोकों को उत्कीर्ण किया गया है। इस ताम्रपत्र के पच्चीसवीं पंक्ति के अंतिमांश और छब्बीसवीं पंक्ति के प्रारंम्भ में उत्कीर्ण श्लोक की दो पंक्तियां इस प्रकार से हैं-

‘‘स्वदत्तां परदत्तां वा यो हरेत वसुन्धरां। 

षष्टि वर्ष सहस्राणि श्वविष्ठया जायते कृमिः’’ 

    अर्थात ‘‘अपने द्वारा दी गई, दूसरों द्वारा दी गई वसुंधरा (भूमि) को जो छीनता है, वह साठ हजार वर्ष पर्यन्त बिष्टा (मल) में कीड़ा होकर जन्म लेता रहता है।’’ भूमिदान को सुरक्षित करने हेतु इस प्रकार के संदर्भ का उपयोग कालान्तर में चंद राजा भारतीचंद के शाके 1373 और रुद्रचंद के शाके 1518 में निर्गत ताम्रपत्र से भी प्राप्त होता है। पाण्डुकेश्वर ताम्रपत्र के मुटठे पर राज्य चिह्न ‘नंदी’ के नीचे क्रमशः श्रीनिम्बर, श्री इष्टगणदेव और ललितशूरदेव का नाम उत्कीर्ण है।

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