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November 24, 2025December 10, 2025

पौरव वंश- प्राचीन ब्रह्मपुर का भूगोल

भारत का प्राचीन इतिहास बीसवीं शताब्दी से पहले जब लिखा गया तो, आर्य जाति के उदय और उत्थान तक सीमित था। आर्यों के मूल निवास को लेकर व्यापक परिचर्चा और शोध उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में प्राचीन भारतीय इतिहास का मुख्य विषय रहा था। आर्यों द्वारा रचित वैदिक ग्रंथों के आधार पर प्राचीन भारतीय इतिहास की घटनाओं को संयोजित किया गया था। लेकिन बीसवीं शताब्दी में भारतीय रेलवे के विस्तार हेतु किये गये निर्माण और खुदाई कार्यों से एक अति प्राचीन सभ्यता का समावेश भारतीय इतिहास में अप्रत्याक्षित रूप में हुआ।

योजना बद्ध और व्यापक अन्वेषणों द्वारा पुरातात्विक इतिहास को प्रकाश में लाने का कार्य सन् 1921 में शुरू हुआ। बीसवीं शताब्दी में सिंधु एंव उसकी सहायक नदियों के जलागम क्षेत्र में व्यापक अन्वेषणों से ‘सैंधव’ या ‘हड़प्पा’ सभ्यता अचानक सामने आयी और इतिहासकारों के लिए पूर्व में लिखित भारतीय इतिहास को पुनः क्रमबद्ध करना आवश्यक हो गया। इसी प्रकार बीसवीं शताब्दी में उत्तराखण्ड के इतिहास में भी नवीन तथ्यों के प्रकाश में आने से पूर्व लिखित इतिहास को पुनः क्रमबद्ध करना आवश्यक हो गया था। 

कुमाऊँ और उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास का लेखन कार्य अनेक अंग्रेज इतिहासकारों के साथ-साथ भारतीय विद्वानां भी ने किया। उन्नीसवीं शताब्दी में जहाँ कुमाऊँ के इतिहास को ‘हिमालयन गजेटियर’ शीर्षक के रूप में ‘एटकिंसन’ ने संकलित किया, वहीं बीसवीं शताब्दी में पंडित बद्रीदत्त पाण्डे ने उनका अनुसरण कर ‘कुमाऊँ का इतिहास’ नामक पुस्तक सन् 1936 ई. में लिखी और उपलब्ध तथ्यों (बागेश्वर शिलालेख तथा कार्तिकेयपुर उद्घोष वाले तामपत्रों) से इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास को ‘कत्यूरी राज्य’ के रूप में पहचान देने में सफल हुए। लेकिन बीसवीं शताब्दी के पुरातात्विक अन्वेषणों ने उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास में ‘कुणिन्द’ और ‘पौरव’ वंश की उपस्थित को प्रमाणिकता के साथ विशिष्ट स्थान दे दिया। ‘कत्यूरी राज्य’ से भी प्राचीन ये दो राजवंश उत्तराखण्ड इतिहास के महत्वपूर्ण काल खण्ड थे।  

बीसवीं शताब्दी जहाँ वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण पुरातात्विक अन्वेषणों का काल रहा। वहीं भारत के सन्दर्भ में भी विभिन्न क्षेत्रों से नवीन ऐतिहासिक तथ्य उजागर हुए। यह कालखण्ड उत्तराखण्ड के प्राचीन इतिहास हेतु नवीन तथ्यों को प्रकाश में लाने और पुरातात्विक अन्वेषणों का सबसे महत्वपूर्ण काल था। इस शताब्दी में जहाँ उत्तराखण्ड के विभिन्न क्षेत्रों से प्रागैतिहासिक शैलाश्रयों की खोज सबसे महत्वपूर्ण थी, तो वहीं स्थानीय राजवंशों के सैकड़ों ताम्रपत्र भी प्रकाश में आये, जो उत्तराखण्ड के इतिहास को विस्तृत आयाम देने के लिए उपयोगी सिद्ध हुए। कुमाऊँ का केन्द्र अल्मोड़ा जनपद उत्तराखण्ड के पुरातत्व का केन्द्र था, जहाँ प्रागैतिहासिक गुहाओं की खोज इस क्षेत्र के अति प्राचीन इतिहास को लिखने में सहायक हुए। 

सन् 1915 ई. में अल्मोड़ा जनपद के गढ़वाल सीमावर्ती क्षेत्र में स्थित तालेश्वर गांव में श्रमिकों को खेत की दीवार निर्मित करते समय दो ताम्रपत्र प्राप्त हुए। परन्तु ये ताम्रपत्र स्थानीय जन मानस और इतिहासकारों के लिए बीसवीं शताब्दी के छठे दशकोपरांत ही प्रकाश में आ पाये। यही कारण है कि ‘कुमाऊँ का इतिहास’ नामक पुस्तक में इन दो महत्वपूर्ण तालेश्वर ताम्रपत्रों का उल्लेख नहीं किया गया। 

पुरातात्विक महत्व के तालेश्वर गांव में कत्यूरी शैली का एक प्राचीन मंदिर है, जो ‘तालेश्वर महादेव’ के नाम से प्रसिद्ध है। कुमाऊँ में ‘तालेश्वर महादेव’ का एक अन्य मंदिर सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ के काली नदी घाटी में झूलाघाट के निकट है। यह भी विचित्र संयोग है कि कुमाऊँ राज्य के अवशेषों में आज भी पूर्वी और पश्चिमी सीमावर्ती क्षेत्र में एक-एक प्राचीन ‘तालेश्वर’ मंदिर है। पश्चिमी रामगंगा जलागम क्षेत्र का तालेश्वर गांव स्याल्दे तहसील के सुरखेत-देघाट सड़क मार्ग के निकट है, जहाँ से प्राप्त ताम्रपत्रों द्वारा ही ‘ब्रह्मपुर का पौरव राजवंश‘ अस्तित्व में आया। इन ताम्रपत्रों में ‘पर्वताकार’ राज्य और ब्रह्मपुर का उल्लेख किया गया है।

ब्रह्मपुर के भूगोल से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी ‘ह्वैनसांग’ (ह्युनसांग) की भारत यात्रा विवरण से प्राप्त हुई है। सातवीं शताब्दी में ह्वैनसांग नाम का एक चीनी यात्री सन् 629 से 643 ई. मध्य तक कुल 14 वर्ष भारत की यात्रा पर रहा था। इस कालखण्ड में उत्तर भारत का सत्ता केन्द्र कन्नौज था, जहाँ पुष्यभूति वंश के सम्राट हर्ष का शासन था। चीनी यात्री ने अपने यात्रा विवरण पर एक ग्रन्थ लिखा जिसे ’सि-यू-की’ कहा जाता है। ह्वैनसांग का भारतागमन उद्देश्य बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों का भ्रमण करने के साथ-साथ बौद्ध धर्म ग्रंथों की पाण्डुलिपियों का संग्रह कर अपने देश ले जाना था। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु वह 629 ई. में ‘तांग’ शासकों की राजधानी ‘चंगन’ (शियान नगर) से ‘‘गंधार, कश्मीर, जालंधर, कुलूट तथा मथुरा होता हुआ थानेश्वर पहुँचा। थानेश्वर से मतिपुर, अहिच्छन्न एवं सांकाश्य होते हुए 636 ई. में उसने हर्ष की राजधानी में कन्नौज में प्रवेश किया।

सन् 606 ई. में कन्नौज राजसिंहासन पर विराजमान होने से पहले ‘थानेश्वर’ ही हर्ष की पैतृक राजधानी थी। विद्वान ह्वैनसांग के यात्रा पथ के एक पड़ाव ‘मतिपुर’ को ब्रह्मपुर राज्य का सीमावर्ती स्थल ‘हरिद्वार’ से संबद्ध करते हैं। 

ह्वैनसांग और उत्तराखण्ड– 

ह्वैनसांग के उत्तराखण्ड यात्रा के संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. शिवप्रसाद डबराल निम्नलिखित तथ्यों को प्रस्तुत करते हैं-

1- ‘‘स्थाण्वीश्वर से उत्तर-पूर्व की ओर 400 लि या 66 मील चलने पर यात्री ‘सु-लु-किन-ना’  जनपद में पहुँचा। जिसकी पहचान कनिंघम ने स्रुघ्न जनपद से की है।’’

2- ‘‘यात्री के अनुसार स्रुघ्न जनपद की परिधि 6000 लि अर्थात 1000 मील थी। जनपद की पूर्वी सीमा पर गंगाजी बहती थी। यमुना नदी जनपद के मध्य से बहती थी जनपद के उत्तरी सीमा पर महान पर्वत खड़ा था।’’

3- यात्री के अनुसार स्रुघ्न की जलवायु स्थाण्वीश्वर की जलवायु के समान थी।

4- युअन्-च्वाड.् ने यमुना से गंगाजी तक की दूरी का अनुमान 800 लि या 133 मील किया था।

5- युअन्-च्वाड.् के यात्रा वर्णन के अनुसार वहाँ से 300 लि अर्थात 50 मील उत्तर की ओर चलकर यात्री पो-लो-कि-मो जनपद में पहुँचा। पो-लो-कि-मो को जूलियन और कनिंघम ने संस्कृत के ब्रह्मपुर का भाषान्तर माना है।

6- यात्री के अनुसार इस जनपद (ब्रह्मपुर) का घेरा 4000 लि या 666 मील था। उसके चारों ओर पर्वतमालाएं थीं।

7- ब्रह्मपुर की जलवायु को भी यात्री ने कुछ ठण्डा बतलाया है। ब्रह्मपुर की मिट्टी उपजाऊ थी उसमें नियमित रूप से दो फसलें होती थीं।

8- मतिपुर से यात्री दक्षिणपूर्व दिशा में 400 लि से कुछ अधिक अर्थात 66 मील से कुछ अधिक चलकर कु-पि-शांग-ना जनपद में पहुँचा। इस जनपद की परिधि 2000 लि या 333 मील थी। इस जनपद की पहचान गोविषाण से की गई है।

9- गोविषाण में वे सब फसलें उत्पन्न होती थीं जो गंगाजी के उत्तरी मैदान में, मतिपुर में होती थीं।

सातवीं शताब्दी में भी मध्य हिमालय प्राचीन कुणिन्द जनपद के अनुक्रम में ‘जनपद’ नामक राज्य इकाई में संगठित था। उत्तर भारत का पर्वतीय और पर्वतपादीय मैदानी भाग मुख्यतः तीन जनपदों में विभाजित था- स्रुघ्न, ब्रह्मपुर तथा गोविषाण (काशीपुर)। ’ह्वैनसांग’ की यात्रा विवरणानुसार हिमालयी जनपदों की भौगोलिक सीमा का निर्धारण विद्वानों ने इस प्रकार से किया- ‘स्रुघ्न जनपद’ में यमुना के पश्चिमी जलागम क्षेत्र से गंगाजी तक का भू-भाग तथा ‘गोविषाण जनपद’ में तराई-भाबर प्रदेश (कुमाऊँ) के साथ दक्षिण-पूर्व के कुछ मैदानी क्षेत्र भी सम्मिलित थे। जबकि ‘ब्रह्मपुर जनपद’ में गंगाजी से काली नदी तक का पर्वतीय भाग सम्मिलित था। 

वाटर्स के उद्धरण की सहायता से डॉ. शिवप्रसाद डबराल लिखते हैं- ‘‘यात्री के अनुसार स्रुघ्नजनपद की परिधि 6000 लि अर्थात 1000 मील थी। इस जनपद की पूर्वी सीमा पर गंगाजी बहतीं थीं। यमुना नदी इस जनपद के मध्य में बहती थी, और जिसकी उत्तरी सीमा पर महान पर्वत (महाहिमालय) खड़ा था।’’ स्रुघ्न की पहचान हरियाणा के अम्बाला से की गयी है। मानचित्र को देखें तो यमुना नदी ‘अम्बाला‘ और ‘हरिद्वार’ से लगभग समान दूरी पर प्रवाहित है। इन दो नगरों के मध्य यमुना और गंगा के तट एक दूसरे से लगभग 60 मील दूरी पर हैं। जबकि ह्वैनसांग का अनुमान लगभग 133 मील था, जो दोगुने से भी अधिक है। 

स्रुघ्न जनपद में उत्तराखण्ड का देहरादून तथा हरिद्वार-टिहरी-उत्तरकाशी जनपदों का गंगा/ भागीरथी नदी का पश्चिमी भू-भाग सम्मिलित था। गोविषाण जनपद में वर्तमान ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जनपद का मैदानी भाग सम्मिलित था। जबकि ब्रह्मपुर में भागीरथी से पूर्व का टिहरी-उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, चमोली, पौड़ी, बागेश्वर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, चम्पावत तथा नैनीताल जनपद का पर्वतीय भू-भाग सम्मिलित था। मध्य हिमालय के भौगोलिक विभाजन से स्पष्ट होता है कि सातवीं शताब्दी में उत्तराखण्ड का सबसे बड़ा राज्य ‘ब्रह्मपुर’ था।

सातवीं शताब्दी के ‘ब्रह्मपुर जनपद’ को चीनी यात्री ह्वैनसांग ने अपने विवरण में ‘पो-लो-कि-मो’ कहा। वाटर्स और कनिंघम के उद्धरणों की सहायता से डॉ. शिवप्रसाद डबराल लिखते हैं- ‘‘युअन्-च्वाड्. के यात्रा वर्णन के अनुसार मतिपुर से 300 लि अर्थात 50 मील उत्तर की ओर चलकर यात्री पो-लो-कि-मो जनपद में पहुँचा। यात्री के अनुसार इस जनपद का घेरा 4000 लि या 666 मील था। उसके चारों ओर पर्वतमालाएं थीं।’’ ब्रह्मपुर की राजधानी का घेरा 20 लि से अधिक था। अर्थात लगभग 6 से 7 किलोमीटर के घेरे में ब्रह्मपुर की राजधानी थी। इस कालखण्ड में पर्वतीय राज्य में इस प्रकार की गणना करना एक यात्री के लिए असाधारण तथ्य प्रतीत होता है।

जनपदीय घेरे की माप के आधार पर ब्रह्मपुर राज्य का सीमांकन करना संदेह-युक्त तथ्य है। लेकिन कनिंघम अलकनंदा से काली-करनाली तक के पर्वतीय भू-भाग को ब्रह्मपुर राज्य के रूप सीमांकन करते हुए लिखते हैं- ’’मानचित्र के ऊपर इस प्रदेश की परिधि पांच-छै सौ मील के लगभग निकलती है, जिसमें यात्री द्वारा उल्लिखित परिधि से अधिक अन्तर नहीं है।’’ 

ह्वैनसांग जब भारत यात्रा पर थे, उस समय चीन में ’टैंग वंश’ (तांग वंश) का शासन था। तांग शासन काल में 1 लि लगभग 323 मीटर’ के तुल्य था। इस पैमाने के आधार पर 4000 लि या 1292 किलोमीटर या 803 मील के लगभग ब्रह्मपुर जनपद का घेरा था। जबकि कनिंघम ने 4000 लि के पैमाने को 666 मील निर्धारित किया। दो पैमाने के माप में भिन्नता से स्पष्ट हो जाता है कि ब्रह्मपुर जनपद को ह्वैनसांग के यात्रा विवरण के आधार पर सीमांकन करना, अनुमान की एक प्रक्रिया मात्र थी। 

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