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October 19, 2025December 10, 2025

 प्रागैतिहासिक पुरास्थल बनकोट- ताम्र उपकरण

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बनकोट पुरास्थल उत्तराखण्ड के पिथौरागढ़ जनपद के नवनिर्मित गणाई-गंगोली तहसील में स्थित एक पर्वतीय गांव है, जिसे ब्रिटिश कालीन पट्टी अठिगांव, परगना गंगोली, जनपद अल्मोड़ा में के रूप में चिह्नित कर सकते हैं। जिस पहाड़ी की उत्तरी पनढाल पर बनकोट गांव बसा है, उसके दक्षिणी पनढाल में सरयू नदी प्रवाहित है। इस गांव के उत्तरी पनढाल का जल सरयू की एक सहायक नदी कुलूर नदी में गिरता है। भौगोलिक स्थिति एवं ऐतिहासिक अनुक्रम के आधार पर कह सकते हैं कि यह गांव चौदहवीं सदी में मणकोट और पूर्व काल में कत्यूरी राजवंश के अधीन था। गंगोली का प्रथम ऐतिहासिक राजवंश मणकोटी मान्य है और इस वंश का शासन मणकोट (गंगोलीहाट के निकटवर्ती सुनार गांव के पूरब में स्थित प्राकृतिक दुर्ग) से संचालित था। 

सोलहवीं सदी में चंद शासक बालो कल्याणचंद ने गंगोली पर अधिकार कर लिया और इसके साथ ही यह गांव भी चंद राज्य के अधीन आ गया। चंद कालीन एक ताम्रपत्र बनकोट के निकट गणाई-गंगोली से प्राप्त हुआ है, जिसमें शाके 1532 (सन् 1610 ई.) उत्कीर्ण है। इस ताम्रपत्र में ‘श्री राजाधिराज पृथ्वीचन्द्र रजवार’ उत्कीर्ण है। रजवार नामान्त से स्पष्ट है कि श्री राजाधिराज उपाधि धारक यह शासक चंद वंशज नहीं था।

रजवार नामन्त वाले शासक अस्कोट राजवंश (उत्तर कत्यूरी) के माने जाते हैं। इस ताम्रपत्र में उत्कीर्ण राजाधिराज की उपाधि से स्पष्ट होता है कि पृथ्वीचन्द्र रजवार समकालीन चंद शासक का अधीनस्थ शासक था। इस ताम्रपत्र के निर्गत किये जाने के समय में कुमाऊँ के चंद राजा लक्ष्मीचंद (1597-1621) थे। इस ताम्रपत्र की मुख्य विशेषता यह कि कुमाऊँ के ताम्रपत्रीय ऐतिहासिक विवरणों में प्रथम बार ‘तमौटा’ शब्द का उल्लेख होना। इतिहासकार इस ‘तमौटा’ शब्द को ‘टमटा’ जाति से संबद्ध करते हैं, जिसका प्रमुख कार्य ताम्र बर्तनों का निर्माण करना था। संभवतः बनकोट से प्राप्त ताम्र मानवाकृतियों के निर्मिता इन्हीं तमौटा/टमटा जाति के पूर्वज थे।

बनकोट गांव-

बेरीनाग-अल्मोड़ा सड़क मार्ग पर स्थित तहसील गणाई-गंगोली से 15 किमी दूर (सड़क मार्ग से) पश्चिम में बनकोट गांव है। इस गांव के आस पास ऐतिहासिक महत्व के अनेक स्थल हैं, जिनमें ‘बणकोट’ नामक प्राकृतिक दुर्ग तथा मंदिरों में- कृष्ण-बलराम, हरू, सैम और भट्टी गांव का प्राचीन विष्णु मंदिर आदि हैं। बनकोट के निकटवर्ती वासीखेत के पर्वत-शिखर पर वासुकिनाग का मंदिर है, जो इस क्षेत्र को नाग संस्कृति से संबद्ध करता है। नाग संस्कृति के अतिरिक्त प्राचीन गंगोली राज्य (मणकोट) ‘कोट-संस्कृति’ के इतिहास को भी रेखांकित करता है। गंगोली में मणकोट, रणकोट, सिमलकोट, बेलकोट, दाणकोट, गुमकोट, सिणकोट, वनकोट, बहिरकोट, धारीधुमलाकोट और जमड़कोट आदि स्थान कोट-संस्कृति के परिचायक हैं। वनकोट को कुमाउनी में ‘बणकोट’ और इस कोट क्षेत्र में निवास करने वाले क्षत्रिय ‘बनकोटी’ कहलाते हैं, जिनके इष्टदेव स्थानीय देवता सैम और हरू है। 

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सैम मंदिर बनकोट

     गणाई गंगोली का बनकोट गांव सन् 1989 ई. में एक पुरातत्व स्थल बन गया। इसका कारण अल्मोड़ा के शैलाश्रय गुहा-चित्र पुरास्थलों से लगभग 40 किमी दूर राजकीय इण्टर कॉलेज बनकोट, विकासखण्ड गंगोलीहाट में भवन निर्माण हेतु खुदाई के दौरान 8 ताम्र उपकरणों प्राप्ति। यहाँ से प्राप्त प्रागैतिहासिक ताम्र उपकरणों के आधार पर अल्मोड़ा के गुहा चित्रित पुरास्थलों और बनकोट को एक दूसरे से संबद्ध कर सकते हैं। लेकिन बनकोट में अल्मोड़ा की भाँति अभी तक गुहा-चित्रकारी पुरास्थल प्रकाश में नहीं आये हैं। जबकि गंगोली क्षेत्र प्राकृतिक गुहाओं के लिए प्रसिद्ध है, जिनमें पाताल भुवनेश्वर गुहा का वर्णन स्कन्द पुराण के मानसखण्ड से भी प्राप्त होता है। संभवतः अल्मोड़ा के गुहा-चित्र स्थलां से आरम्भिक मानव ने ताम्रयुग में सरयू नदी के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र बनकोट की ओर आव्रजन किया था।

ताम्रनिधि-संस्कृति के उपकरण, जो ’बनकोट’ से प्राप्त हुए हैं, इन्हें अन्वेषकों ने ई. पू. द्वितीय सहस्राब्दी का अनुमानित किया है। संभवतः इस क्षेत्र में स्थित प्राचीन ताम्र-खानें ’ताम्र निखात संस्कृति’ के विकास में सहायक सिद्ध हुईं। बनकोट के आसपास के क्षेत्रों में बिटिश काल में कुल ताँबे की 4 खाने थीं, इनमें से दो ताँबाखान अठिगांव पट्टी में थीं। ब्रिटिश कालीन अठिगांव पट्टी में ही बनकोट गांव स्थित है। बनकोट के ताम्र उपकरणों में ‘‘तांबा (98 प्रतिशत) और लोहा (1.22 प्रतिशत) पाया गया।’’ इन ताम्र उपकरणों से स्पष्ट होता है कि मध्य हिमालय के प्राचीन ताम्र शिल्पकार धातु मिश्रण कला से भी परिचित थे।

ताम्र-उपकरण आकृति –

   बनकोट पुरास्थल से प्राप्त ताम्र-उपकरण मानवाकृति के प्रतीक हैं। परन्तु डी. पी. शर्मा अपने एक शोधपत्र (1997) में इन्हें मानवाकृति नहीं मानते, प्रत्युत ताम्र उपकरण संस्कृति के नये ’स्कन्धित कुठार’ मानते है। ‘स्कन्ध’ संस्कृत का पुल्लिंग शब्द है, जिसके अनेक अर्थ- ‘कंधा’, ‘वृक्ष का वह भाग, जहाँ से डालियां निकलती हैं’, ‘खण्ड’, ‘शरीर’, ‘आचार्य’, ‘युद्ध’, ग्रंथ का विभाग’, ‘समूह’, और ‘सेना का अंग’ आदि हैं।

जबकि ‘कोठार’ भी संस्कृत का पुल्लिंग शब्द है, जिसके भी अनेक अर्थ- ‘कुल्हाड़ा’, ‘परशु’, ‘सत्यानाशी’, ‘वृक्ष’ और ‘अनाज रखने का बड़ा बर्तन’ आदि हैं। स्कन्ध में संस्कृत का तद्धित प्रत्यय ‘इत’ (गुणात्मक प्रत्यय) लगाने से ‘स्कन्धित’ शब्द बनता है। अतः ‘स्कन्धित कोठार’ के अनेक अर्थ हो सकते हैं, जैसे- ‘‘कंधा जैसा कुल्हाड़ा या परशु’’, ‘‘शरीर जैसा कुल्हाड़ा या परशु’’, ‘‘युद्ध का कुल्हाड़ा या परशु’’ और आचार्य का कुल्हाड़ा या परशु’ आदि हो सकते हैं। लेकिन बनकोट के ताम्र उपकरण, आकृति और उपयोगिता में कुल्हाड़ा या परशु जैसे प्रतीत नहीं होते हैं।

     प्रो. डी.पी. अग्रवाल इसे चिड़िया का शिकार करने हेतु प्रयुक्त उपकरण बूमरैंग के रूप में पहचानते हैं। ‘बूमरैंग’ अंग्रेजी भाषा में उस बक्राकार लघु काष्ठ टुकड़े को कहा जाता है, जिसे फेंकने से वह घूमकर वापस लौट आता है। बनकोट के ताम्र उपकरणों को ‘बूमरैंग’ कहना उचित प्रतीत नहीं होता है। ताम्र उपकरणों का आकार बूमरैंग से भिन्न है। इसी प्रकार पी.के. अग्रवाल ने इस मानवाकृति को ’श्रीवत्स चिह्न’ तथा दीक्षित एवं शुक्ला ने इसे ’देवाकृति’ कहा है, किन्तु एम. पी. जोशी ने इस उपकरण को ’परशु पुरुष’ की संज्ञा दी है। ‘श्रीवत्स चिह्न’ हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के लिए मंगलकारी चिह्न है, जो वक्षस्थल पर अंकित रहता है। ‘श्रीवत्स’ शब्द ‘श्री’ और ‘वत्स’ से बना है, जहाँ ‘श्री’ का अर्थ- ‘लक्ष्मी’ और ‘वत्स’ का अर्थ- ‘पुत्र’ होता है। अर्थात ‘लक्ष्मी पुत्र’।

हिन्दुओं और जैनों के ‘श्रीवत्स’ चिह्न में पुष्प और आलेखन तथा बौद्धों के ‘श्रीवत्स’ चिह्न में चक्र और पुष्प महत्वपूर्ण अंग होते हैं। बनकोट के ताम्र उपकरण और श्रीवत्स चिह्न अंश मात्र भी समरूप नहीं है। ना ही बनकोट के गुरुत्व वाले ताम्र उपकरण उपयोगिता में श्रीवत्स चिह्न जैसे प्रतीत होते हैं।

    ‘दीक्षित एवं शुक्ला ने इन उपकरणों को ‘देवाकृति’ कहा है। आकृति और उपयोगिता के आधार पर इन ताम्र उपकरणों को प्रतीक रूप में धर्म से संबद्ध कर सकते हैं। इसी प्रकार एम. पी. जोशी ने इन ताम्र उपकरणों को ‘परशु पुरुष’ कहा, जो उचित प्रतीत नहीं होता है। इन्हें या तो ‘परशु’ या ‘पुरुष’ में से एक ही प्रतीक नाम दे सकते हैं, संयुक्त नाम नहीं। प्रो. डी.डी. शर्मा के अनुसार- ‘‘उत्तराखण्ड के कुमाऊँ मंडल के बनकोट पिथौरागढ़ से प्राप्त तांबे की अनघड़ चपटी मानवाकृतियों की उपलब्धि इस तथ्य के प्रत्यक्ष साक्ष्य हैं कि इस क्षेत्र में ताम्रशिल्प का प्रारम्भ प्रागैतिहासिक ताम्रयुग में ही हो चुका था।’’  

बनकोट से प्राप्त ताम्र-उपकरणों का भिन्न-भिन्न नामकरण शोधकर्त्ताओं द्वारा किया गया है। नामकरण के विभिन्न आधार हो सकते हैं। लेकिन प्रथम दृष्टि से ये ताम्र उपकरण चपटी मानवाकृति प्रतीत होते हैं। जिस प्रकार शोधकर्त्ता अल्मोड़ा के गुहा-शैलों में चित्रित सरल और वक्र रेखाओं को मानवाकृति मानते हैं, उसी प्रकार हमें बनकोट से प्राप्त ताम्र उपकरणों को भी मानवाकृति मानना चाहिए। पिथौरागढ़ नगर के निकटवर्ती नैनीपातल से प्राप्त ताम्र मानवाकृतियां मिट्टी के एक घड़े में संचित थे। इस आधार पर इनकी उपयोगिता को धार्मिक कर्मकाण्डों से संबद्ध कर सकते हैं। संभवतः पितृ पूजा संस्कार के तहत इन ताम्र मानवाकृतियों का उपयोग आद्-ऐतिहासिक कालीन मानव ने किया।

कुमाऊँ में पितृ पूजा की परम्परा अति प्राचीन है, जिसकी पुष्टि विभिन्न स्थानां से प्राप्त विरखम (प्रस्तर स्तंभ) भी करते हैं। इन ताम्र मानवाकृतियों की उपयोगिता के संबंध में भी इतिहासकारों में मतभेद है। ‘‘वस्तुतः ताम्र-मानवाकृति सी दिखायी देने वाले इन उपकरणों के वास्तविक प्रयोग से, निश्चित ही हम अभी अपरिचित हैं।’’ प्राचीन धर्मों- सनातन, जैन और बौद्ध तथा विस्तृत सांस्कृतिक धरोहर के आधर पर इन ताम्र उपकरणों का नामकरण करना, प्राप्त पुरातत्व सामग्री की एक पक्षीय विवेचना होगी।

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