राम के पूर्वज पाताल भुवनेश्वर गुहा आये थे। गुहा ही आरम्भिक मानव निवास स्थल थे। मध्य हिमालय का भूवैज्ञानिक इतिहास आद्य महाकल्प के द्वितीय युग ‘इयोसीन’ से आरम्भ होता है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार इस युग में टेथिस सागर के स्थान पर हिमालय का निर्माण आरम्भ हुआ और यह प्रक्रिया निरन्तर जारी है। जबकि आरम्भिक…
Month: November 2025
सरयू-पूर्वी रामगंगा का अंतस्थ क्षेत्र
कुमाऊँ का ‘गंगोली’ क्षेत्र भी एक विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक क्षेत्र है। इस विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र को सरयू-पूर्वी रामगंगा का अंतस्थ क्षेत्र भी कह सकते हैं। वर्तमान में गंगोली का मध्य-पूर्व और दक्षिणी क्षेत्र पिथौरागढ़ तथा मध्य-पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्र बागेश्वर जनपद में सम्मिलित है। गंगोली के राजनीतिक भूगोल का अर्थ- इस विशिष्ट…
चंद राजा विक्रमचंददेव का कालखण्ड
मध्य हिमालय में कुमाऊँ राज्य की स्थापना का श्रेय चंद राजवंश को जाता है। चंदों से पूर्व कुमाऊँ राज्य उत्तर कत्यूरी शासकों में विभाजित था। कत्यूरी राज्य का विभाजन वर्ष सन् 1279 ई. को माना जाता है, जब कत्यूरी त्रिलोकपाल के पुत्र अभयपाल कत्यूर से अस्कोट चले गये। इस कालखण्ड में कत्यूरी वंशजों…
चार बूढ़ा- एक मध्यकालीन राज्य पद
‘चार बूढ़ा’ एक मध्यकालीन राज्य पद था, जिसका सम्बन्ध चंद राज्य से था। कुमाऊँ में चंद राज्य का आरंभिक सत्ता केन्द्र चंपावत था। चंपावत नगर के निकट राजबूंगा चंद राज्य की आरंभिक राजधानी थी। चंद कौन थे ? इतिहासकारों के एक मतानुसार सोमचंद आठवीं सदी के आरंभ तथा दूसरे मतानुसार थोहरचंद तेरहवीं सदी…
चार चौधरी- चंद राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था
सम्पूर्ण कुमाऊँ के प्रथम चंद राजा रुद्रचंददेव थे। इस चंद राजा ने यह महान उपलब्धि सन् 1581 ई. में काली और पूर्वी रामगंगा अंतस्थ क्षेत्र में स्थित सीराकोट को विजित कर प्राप्त की। इस विजय के साथ सम्पूर्ण कुमाऊँ राज्य चंद वंश के अधीन आ गया, जिनकी राजधानी मात्र अठारह वर्ष पहले चंपावत…
चंद राजा और कुमाऊँ का मध्य कालीन इतिहास
उत्तराखण्ड के इतिहास में मध्य कालीन इतिहास विशेष महत्व रखता है। इस कालखण्ड में यह पर्वतीय राज्य दो क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित था। पश्चिमी रामगंगा और यमुना के मध्य का भू-भाग गढ़वाल तथा पश्चिमी रामगंगा और कालीनदी मध्य का भू-भाग कुमाऊँ कहलाता था। ऐतिहासिक मतानुसार नौवीं सदी में गढ़वाल के चमोली जनपद में जहाँ…
बटखोरी या बड़ोखरी का पर्वतीय दुर्ग
इतिहास में कुछ युद्ध स्थल विशेष महत्व रखते हैं। ‘पानीपत’ व ‘तराईन’ की युद्ध भूमि दिल्ली की सत्ता के लिए एक द्वार के समान थे। इन दोनों युद्ध स्थलों को दिल्ली पर शासन करने योग्य शासकों का चुनाव स्थल कह सकते हैं। प्राचीन काल से भारतीय राजाओं ने शत्रु से बचाव हेतु दुर्भेद्य दुर्गों का निर्माण समय-समय पर किया…
बड़ोखरी दुर्ग (ऐतिहासिक स्रोत)
इतिहासकार बद्रीदत्त पाण्डे ने ‘कुमाऊँ का इतिहास’ नामक पुस्तक में इस दुर्ग का वर्णन किया है। इस दुर्ग को उन्होंने गुलाब घाटी (राष्ट्रीय राजमार्ग 87 पर काठगोदाम ) के पास चिह्नित किया। डॉ. शिवप्रसाद डबराल ने ‘उत्तराखण्ड के अभिलेख एवं मुद्रा’ नामक पुस्तक में चंद राजा दीपचंद का एक ताम्रपत्र (शाके 1677 या सन् 1755…
बिठोरिया- हल्द्वानी के विरखम
मध्य हिमालय (कुमाऊँ क्षेत्र) प्राचीन एवं मध्यकालीन प्रस्तर स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। बैजनाथ-गरुड़, द्वाराहाट, बागेश्वर, कटारमल, जागेश्वर, मोहली-दुगनाकुरी, थल, वृद्धभुवनेश्वर-बेरीनाग, जाह्नवी नौला-गंगोलीहाट तथा बालेश्वर-चंपावत आदि मंदिर समूह प्राचीन और मध्यकालीन कुमाउनी मंदिर स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मंदिर स्थापत्य कला के साथ-साथ मध्य हिमालय में मूर्ति कला का भी विकास हुआ। देव…
मणकोट-गंगोलीहाट का प्राचीन इतिहास
मणकोट नामक स्थान जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट तहसील में स्थित है। इतिहासकार प्राचीन गंगोली राज्य के विभिन्न राजवंशों को मणकोट से संबद्ध करते हैं। ‘‘कत्यूरी-राज्य के समय तमाम गंगोली का एक ही राजा था। उसके नगर दुर्ग का नाम मणकोट था। राजा भी मणकोटी कहलाता था।’’ मणकोट का सामरिक महत्व देखें, तो यह दुर्ग एक…