प्राचीन काल से एक राजा के लिए राज्य पदाधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। योग्य पदाधिकारियों की सहायता से ही राजा जनकल्याण के कार्य करते थे। राजा बालो कल्याणचंददेव का शासन काल और राज्य पद भी चंद राज्य के उत्थान का एक महत्वपूर्ण कारक था। सोहलवीं शताब्दी में इस राजा का शासन काल चंद वंश…
Month: November 2025
महाराजाधिराज कल्याणचंददेव का शासन काल
बालो कल्याणचंददेव द्वारा निर्गत भेटा ताम्रपत्र (शाके 1467) में उनकी उपाधि महाराजाधिराज उत्कीर्ण है। अर्थात बालो कल्याणचंददेव 31 मई, सन् 1545 ई. को महाराजाधिराज की उपाधि के साथ चंद राजसिंहासन पर आसित हो चुके थे। इस ताम्रपत्रानुसार- ’‘महाराजाधिराज स्री कल्यानचंद्र देव ले संकल्पपूर्वक जीर्णो धार करि राजा भीष्मचंद की दिनी।’’ इस ताम्रपत्र में भीष्मचंद का…
राजा कल्याणचंददेव का जाखपंत ताम्रपत्र
राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र कुमाऊँ में विस्तृत चंद राज्य के प्रमाण को प्रस्तुत करते हैं। इस राजा के शासन काल में चंद राज्य की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानान्तरित हुई। अन्य चंद राजाओं की भाँति राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र भी स्थानीय कुमाउनी भाषा में उत्कीर्ण हैं। जबकि उत्तराखण्ड के पौरव और कार्तिकेयपुर राजवंश के शासकों…
राजा कल्याणचंददेव का गौंछ ताम्रपत्र
राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र कुमाऊँ में विस्तृत चंद राज्य के प्रमाण को प्रस्तुत करते हैं। इस राजा के शासन काल में चंद राज्य की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानान्तरित हुई। अन्य चंद राजाओं की भाँति राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र भी स्थानीय कुमाउनी भाषा में उत्कीर्ण हैं। राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र भी उसके शासन काल को…
कल्याणचंददेव का भेटा ताम्रपत्र
राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र कुमाऊँ में विस्तृत चंद राज्य के प्रमाण को प्रस्तुत करते हैं। इस राजा के शासन काल में चंद राज्य की राजधानी चंपावत से अल्मोड़ा स्थानान्तरित हुई। अन्य चंद राजाओं की भाँति राजा कल्याणचंददेव के ताम्रपत्र भी स्थानीय कुमाउनी भाषा में उत्कीर्ण हैं। जबकि उत्तराखण्ड के पौरव और कार्तिकेयपुर राजवंश के शासकों…
मध्य कालीन कुमाऊँ में त्रिकोणीय संघर्ष
मध्य कालीन भारतीय इतिहास में कन्नौज का त्रिकोणीय संघर्ष अपना विशेष महत्व रखता है। इसी प्रकार मध्य हिमालय के पर्वतीय राज्य कुमाऊँ का त्रिकोणीय संघर्ष भी उत्तराखण्ड के स्थानीय इतिहास में अपना महत्व रखता है। कन्नौज के त्रिकोणीय संघर्ष में गुर्जर-प्रतिहार, पाल और राष्ट्रकूट सम्मिलित थे, वहीं कुमाऊँ का त्रिकोणीय संघर्ष डोटी के मल्ल, चम्पावत…
जाह्नवी देवी नौला स्थापत्य शैली
गंगोलीहाट का जाह्नवी देवी नौला उत्तराखण्ड के प्राचीन अमूल्य धरोहरों में से एक है। स्थानीय लोग जाह्नवी देवी नौला को ‘जानदेवी’ नौला कहते हैं। यह नौला पर्वतीय स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उत्तराखण्ड का कुमाऊँ क्षेत्र प्राचीन मंदिरों के साथ-साथ नौला स्थापत्य के लिए भी प्रसिद्ध है। प्राचीन काल में मंदिरों के…
गंगोली का उत्तर कत्यूरी राजवंश
भारतीय इतिहास को जिस प्रकार गुप्त और उत्तर गुप्त शासन काल में विभाजित किया गया, ठीक इसी प्रकार उत्तराखण्ड के प्राचीन कत्यूरी राजवंश को भी कत्यूरी और उत्तर कत्यूरी काल में विभाजित किया गया है। मध्य हिमालय के इस राजवंश के विभाजन स्वरूप उत्तराखण्ड के कुमाऊँ क्षेत्र में कुछ क्षेत्रीय राज्य अस्तित्व में आये…
जाह्नवी देवी नौला अभिलेख- देवनागरी लिपि
जाह्नवी देवी नौला लेख देवनागरी लिपि तथा संस्कृत भाषा में लिखा गया है। सम्पूर्ण लेख इस प्रकार से है- 1- :।।ऊँ स्वि स्त गण पति प्र सादा त्ः अभि प्रताप्वन्सी धर्थं पूजीतोः अयस्य स्वरैरपीः 2- सर्व विघ्न क्षीते त्र स्व : गणा धिप ते न मः।। संवत् सर् 1321 मासानी 4 वार 3-.सि ला नीश…
जाह्नवी नौला अभिलेख -एक लघु शिलापट्ट
गंगोलीहाट का जाह्नवी नौला अभिलेख एक लघु शिलापट्ट पर उत्कीर्ण है। यह नौला पर्वतीय स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उत्तराखण्ड का प्राचीन इतिहास स्थानीय पर्वतीय स्थापत्य की दृष्टि अति महत्वपूर्ण था। उत्तरकाशी (बाड़ाहाट) से नेपाल के बैतड़ी तक विस्तृत पर्वतीय क्षेत्र से प्राप्त सैकड़ों प्राचीन मंदिर-नौले स्थानीय पर्वतीय स्थापत्य शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इस…