उत्तराखण्ड का मध्यकालीन इतिहास पंवार और चंद वंश का पारस्परिक युद्धों का कालखण्ड रहा था। मध्यकालीन उत्तराखण्ड में पंवार तथा चंद वंश को क्रमशः गढ़वाल और कुमाऊँ राज्य स्थापित करने का श्रेय जाता है। चंद राजा रुद्रचंददेव सोहलहवीं शताब्दी में कुमाऊँ राज्य को स्थापित करने में सफल हुए थे। लेकिन रुद्रचंददेव से सैकड़ों वर्ष पहले…
Month: November 2025
उत्तर-कत्यूरी काल में कुमाऊँ के स्थानीय राज्य
तेरहवीं शताब्दी में महान कत्यूरी राज्य के पतनोपरांत स्थानीय राज्यों का उदय हुआ, जिसे उत्तर कत्यूरी काल कहा जाता है। कत्यूरियों के कुमाऊँ राज्य का विभाजन कत्यूरी राजपरिवार की विभिन्न शाखाओं में हुआ, जिनमें मुख्यतः अस्कोट के पाल और डोटी के मल्ल थे। उत्तर कत्यूरी कालखण्ड के आरंभिक वर्षों में कुमाऊँ के स्थानीय क्षत्रपों ने…
अस्कोट के रजवार शासकों के ताम्रपत्र
अस्कोट के रजवार शासकों के ताम्रपत्र कुमाऊँ के पृथक-पृथक स्थानों से प्राप्त हुए है, जो कुमाऊँ के सरयू पूर्व भू-भाग पर रजवारों द्वारा शासित क्षेत्र के राजनैतिक भूगोल को निर्धारित करने में सहायक हैं। तेरहवीं शताब्दी के अंतिम पड़ाव में कुमाऊँ का सरयू पूर्व क्षेत्र सीरा, सोर और गंगोली राज्य में विभाजित हो चुका था।…
किरौली ताम्रपत्र- गंगोली के रजवार
किरौली ताम्रपत्र का संबंध गंगोली राज्य के रजवार शासकों से था। उत्तराखण्ड का प्राचीन कत्यूरी राज्य तेरहवीं शताब्दी में क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित हो गया था। इनमें से एक राज्य सरयू-पूर्वी रामगंगा अंतस्थ क्षेत्र में स्थित था, जिसे ‘गंगावली’ या ‘गंगोली’ कहा गया। प्राचीन गंगोली राज्य नाग मंदिरों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र विशेष…
आनन्दचंद रजवार का किरौली ताम्रपत्र
बड़ाऊँ या वर्तमान बेरीनाग तहसील के किरौली गांव से अस्कोट राजपरिवार के रजवार शासक आनन्दचंद रजवार का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ, जिसे किरौली ताम्रपत्र कहा जाता है। रजवार शासक का किरौली ताम्रपत्र सर्वप्रथम सन् 1999 ई. में प्रकाश में आया था। यह ताम्रपत्र राजाधिराज आनन्द रजवार ने पूजा-पाठ हेतु केशव पंत को सन् 1597 ई. में…
गंगोली में सामन्ती शासन व्यवस्था
गंगोली में सामन्ती शासन व्यवस्था सोलहवीं शताब्दी में चंद कालीन कुमाऊँ राज्य की प्रमुख विशेषता थी। इस सामन्ती शासन काल को रजवार शासन काल भी कह सकते हैं। गंगोली में सामन्ती शासन, चंद राजा रुद्रचंद द्वारा सीराकोट को विजित करने के उपरांत शुरू हुआ था। सीराकोट पूर्वी रामगंगा और काली अंतस्थ क्षेत्र का सबसे दुर्भेद्य…
कुमाऊँ- गंगोली के रजवार शासक
तेरहवीं शताब्दी में कत्यूरी राज्य के पतनोपरांत मध्य हिमालय (कुमाऊँ क्षेत्र) स्वतंत्र लघु राज्य इकाइयों में विभाजित हो गया था। उन्हीं में एक गंगोली भी था। कुमाऊँ की दो प्रमुख नदियों सरयू और पूर्वी रामगंगा से घिरे भू-भाग को गंगोली कहा जाता था, जहाँ सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में ‘रजवार’ नामान्त उपाधि धारक शासकों ने राज्य…
कुमाऊँ का मध्य कालीन इतिहास – चंद ताम्रपत्र
चंद ताम्रपत्र, जहाँ कुमाऊँ के मध्य कालीन इतिहास हेतु विस्तृत सामग्री प्रस्तुत करते हैं, वहीं उत्तराखण्ड के प्राचीन और मध्य कालीन इतिहास के प्रमुख स्रोत भी ताम्रपत्र हैं। कुमाऊँ के विभिन्न क्षेत्रों से सैकड़ों चंद ताम्रपत्र प्राप्त हो चुके हैं, वहीं उत्तराखण्ड के प्राचीन पौरव और कार्तिकेयपुर राज्य के क्रमशः दो व पांच ताम्रपत्र प्राप्त…
बालो कल्याणचंददेव का गंगोली पर अधिकार
बालो कल्याणचंददेव का गंगोली पर अधिकार चंद राज्य के लिए महान उपलब्धि थी। इस राज्य पर अधिकार के साथ चंद शासकों के लिए सम्पूर्ण कुमाऊँ पर अधिकार करने का मार्ग प्रशस्त हो गया। कुमाऊँ में चंद राज्य का विस्तार धीरे-धीरे सैकड़ों वर्षों की राजपथ यात्रा में हुआ। चंद राज्य की आरंभिक राजधानी चम्पावत में थी,…
चंद शासन काल में गंगोला राज्य पद
गंगोला राज्य पद कुमाऊँ में चंद वंश के शासन काल में अस्तित्व में आया था। चंद राज्य पदों की एक विशेषता थी कि कालान्तर में एक राज्य पद जातिगत व्यवस्था में परिवर्तित हो एक जाति बन जाती थी। जैसे विशिष्ट राज्य पद से कुमाऊँ में बिष्ट जाति अस्तित्व में आयी। कुमाऊँ की बिष्ट…