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November 22, 2025December 10, 2025

बिठोरिया- हल्द्वानी के विरखम

मध्य हिमालय (कुमाऊँ क्षेत्र) प्राचीन एवं मध्यकालीन प्रस्तर स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध है। बैजनाथ-गरुड़, द्वाराहाट, बागेश्वर, कटारमल, जागेश्वर, मोहली-दुगनाकुरी, थल, वृद्धभुवनेश्वर-बेरीनाग, जाह्नवी नौला-गंगोलीहाट तथा बालेश्वर-चंपावत आदि मंदिर समूह प्राचीन और मध्यकालीन कुमाउनी मंदिर स्थापत्य कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। मंदिर स्थापत्य कला के साथ-साथ मध्य हिमालय में मूर्ति कला का भी विकास हुआ। देव एवं मानव मूर्तियों के अतिरिक्त यहाँ मूर्ति कला के एक विशिष्ट स्वरूप का विकास हुआ, जिसे स्तम्भ मूर्ति कला कह सकते हैं। स्थानीय लोग पाषाण स्तम्भ की इन मूर्तियों को ‘विरखम’ कहते हैं। उत्तराखण्ड के प्राचीन और मध्य कालीन शासकों ने स्थान-स्थान पर मंदिर और नौला के साथ विरखम भी स्थापित करवाये। बिठोरिया, हल्द्वानी के विरखम भी कुमाऊँ के प्राचीन इतिहास के महत्वपूर्ण धरोहर हैं । 

 विरखम क्या है?

जन साधारण के अनुसार वीर के प्रस्तर स्तम्भ को विरखम कहा जाता है। ‘‘कुमाउनी बोली का विरखम शब्द हिन्दी भाषा के वीर स्तम्भ का तद्भव है, जो वीर तथा साहसी व्यक्ति की स्मृति में स्थापित किये जाते थे।’’ कुमाउनी बोली में स्तम्भ को ‘खम’ कहा जाता है। ‘खम’ शब्द खम्भा का तद्भव है, जिसका अर्थ स्तम्भ होता है। जबकि ‘वीर’ संस्कृत पुल्लिंग शब्द है, जिसका अर्थ- ‘‘योद्धा, सैनिक, बहादुर, साहसी, निर्भय इत्यादि होता है।’’ इस प्रकार बहादुर सैनिक/योद्धा के प्रस्तर स्तम्भ हेतु कुमाउनी में ‘विरखम’ शब्द प्रचलन में आया।

    विरखम क्या हैं? इस संबंध में इतिहासकारों और शोधकर्त्ताओं के मत इस प्रकार से हैं-

1- पं. बद्रीदत्त पाण्डे- ‘‘तमाम कुमाऊँ प्रान्त व गढ़वाल इनके बनवाये मंदिरों व नौलों से भरा है। जहाँ कहीं मंदिरों की प्रतिष्ठा करने में यज्ञ किया या कहीं कोई धर्म-कार्य किया या पूजन किया, तो वहाँ पर यज्ञस्तम्भ या बृहत्स्तम्भ जमीन में गाड़ देते थे। अब उनको वृखम कहते हैं।’’

2- शोधार्थिनी शीला नियोलिया- ‘‘वीर स्तम्भों की उत्पत्ति बौद्धों की स्मारक पूजा पद्धति से हुई है। इसकी उत्पत्ति पूर्ववर्ती लोगों या वैदिक ग्रंथों के असुरों की अन्त्येष्टि की पद्धति से भी मानी जाती है।’’

     कुमाऊँ के विरखमों पर शोध करने वाली शोधार्थिनी शीला नियोलिया और इतिहासकार बद्रीदत्त पाण्डे दोनों ही विरखम को धर्म से संबद्ध करते हैं। दोनों के मत में आर्य और अनार्य का अन्तर है। आर्य अर्थात यज्ञ और धार्मिक कार्य। अनार्य अर्थात असुर अन्त्येष्टि पद्धति। शीला नियोलिया विरखम को बौद्ध स्मारक पूजा पद्धति से संबद्ध करतीं हैं। विरखम पर उकेरे गये चित्रों जैसे- तलवार-ढाल युक्त घुड़सवार सैनिक के आधार पर कह सकते हैं कि इनका बौद्ध धर्म के स्मारक पूजा पद्धति से निकट का भी संबंध नहीं था। ‘‘साधारणतया वीर स्तम्भों या स्मृति स्मारकों में अश्वारोही का अंकन होता है। परन्तु कच्छ, सौराष्ट्र तथा गुजरात के उत्तरी भागों में ऊँट सवार योद्धा का अंकन है।’’ कुमाऊँ के घुड़सवार और पश्मिची भारत के ऊँट सवार योद्धा का बौद्ध तथा हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति से निकट का संबंध स्थापित नहीं होता है। उदाहरणतः मोहली गांव (नाकुरी, जनपद बागेश्वर) के सात विरखम समूह एक चबूतरे पर स्थापित हैं। इन सात विरखमों का पूजा पद्धति या धार्मिक संस्कारों से कोई संबंध नहीं है। अन्यथा यह स्थल एक तीर्थ और पूजा-पाठ स्थल बन चुका होता। आज भी यह स्थल वन भूमि पर मोहनी गांव के सीमावर्ती क्षेत्र में अपूजित है। घुड़सवार, तलवार-ढाल युक्त पैदल सैनिक आदि के उकेरे गये चित्रों के आधार पर कह सकते हैं कि विरखम योद्धाओं के स्मारक थे, जिन्हें उनके क्षेत्र विशेष में स्थापित किया जाता था।

विरखम के उपांग-

विरखम को आकार और आलेखन के आधार पर निम्नलिखित भागों में विभाजित कर सकते हैं। ‘‘वीरखम के मुख्य रूप से छः भाग हैं।’’

1- शिवलिंग नुमा भाग।                  2- आमलक नुमा भाग।

3- ग्रीवा नुमा भाग।                        4- चौखट या गवाक्ष युक्त भाग।

5- पट्टी भाग।                                 6- शिखर शैल नुमा भाग।

    विरखम का शीर्ष भाग, जिसका आकार लिंग की तरह होता है, लिंग नुमा भाग कहलाता है। यदि योद्धा की दृष्टि से देखें तो यह भाग एक टोपी नुमा है। अर्थात इस भाग को योद्धा की धातु-टोपी या सिरस्त्राण कह सकते हैं। शीर्ष से नीचे वाला भाग मंदिर के आमलक की भाँति होता है। इस भाग को योद्धा का मुख मण्डल कह सकते हैं। आमलक से नीचा वाला भाग ग्रीवा की भाँति होता है। अतः इस भाग को योद्धा की ग्रीवा कह सकते हैं। ग्रीवा से नीचे चौखट या गवाक्ष युक्त भाग होता है। इस भाग को योद्धा का वक्ष स्थल कह सकते हैं, जो प्रस्तर स्तम्भ का सबसे मजबूत व चौड़ा भाग होता है। चौखट या गवाक्ष युक्त भाग से नीचे का भाग पट्टी कहलाता है। इस भाग को योद्धा के उदर और कमर से तुलना कर सकते हैं। अंतिम भाग को शिखर शैल कहा जाता है, इसका योद्धा के पाद से तुलना कर सकते हैं।

बिठोरिया के विरखम-

    कुमाऊँ के अतिरिक्त प्राचीन काल से गढ़वाल, कच्छ, सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात में भी विरखम स्थापित करने की परम्परा थी। कुमाऊँ में सैकड़ों की संख्या में विभिन्न स्थानों से विरखम प्राप्त हुए हैं। इनमें से अधिकांश विरखम पर्वतीय क्षेत्रों में स्थापित किये गये थे। कुमाऊँ के मैदानी क्षेत्र हल्द्वानी विकास खण्ड के बिठोरिया ग्राम के उत्तर में तथा दमुवां ढूंगा के पश्चिम में पर्वतपादीय भू-भाग में 4 मंदिराकृति के विरखम स्थापित हैं। इस विरखम स्थल से 100 मीटर दक्षिण में मां भगवती मंदिर है, जिसकी स्थापना का श्रेय श्री गुरुदेव नान्तिन महाराज (‘‘सन् 1960-70 ई. के मध्य कई रात्रि यहाँ विश्राम किया था।’’) को जाता है। इस भगवती मंदिर में भी मंदिराकृति का एक विरखम स्थापित है। संभवतः यह विरखम पर्वतपादीय मैदान से लाया गया। बिठोरिया का यह विरखम स्थल समुद्र सतह से 464 मीटर की ऊँचाई पर तथा 79° 29’ 09’’ उत्तरी अक्षांश और 29° 14’ 13’’ पूर्वी देशांतर रेखा पर स्थित है।

बिठोरिया, हल्द्वानी का ऐतिहासिक विरखम स्थल संरक्षण विहीन हैं। भाबर क्षेत्र का यह विरखम स्थल कत्यूरी और चंद कालीन इतिहास का एक मात्र अवशेष स्थल है। वर्तमान में इस विरखम स्थल के चारों ओर सागौन का सघन वन आच्छादित है। ये विरखम उत्तर से दक्षिण की ओर स्थापित हैं। इस विरखम परिसर में एक हवनकुण्ड भी है, जो यहाँ यज्ञ आदि धार्मिक प्रक्रम किये जाने का प्रमाण है। हवनकुण्ड और विरखम त्रिभुजाकार आकृति निर्मित करते हैं। कुमाऊँ से प्राप्त अधिकांश विरखम स्तम्भाकार हैं। लेकिन यहाँ से प्राप्त विरखम मंदिराकार हैं। गर्भगृह विहीन लघु मंदिर जैसे ये विरखम आधार में घनाभाकार हैं, जिसके एक लम्बवत् फलक पर गवाक्ष के भीतर स्त्री-पुरुष को उकेरी गया है। ये विरखम त्रिरथ शैली में निर्मित हैं। इस आधार पर इन पाषाण आकृतियों को मंदिराकृत विरखम कह सकते हैं। बिठोरिया के वन भूमि के चार विरखमों में से एक विरखम शीर्ष (लिंग और आमलक) युक्त है। शेष तीन विरखम शीर्ष विहीन हैं।

     बिठोरिया के विरखम सामान्यतः स्तम्भ विरखम से भिन्नाकृति के हैं। थल, जनपद पिथौरागढ़ के एक हथिया देवाल मंदिर (एकाश्म प्रस्तर से निर्मित) की भाँति यदि इन विरखमों में भी गर्भगृह होता तो निश्चित ही लघु मंदिर कहलाते। इन चार विरखमों से सबसे उत्तर का विरखम शीर्ष युक्त है, जिसकी कुल ऊँचाई 3 फीट, 1 इंच है। इस विरखम के आधार और शीर्ष का परिमाप क्रमशः 4 फीट, 3 इंच और 2 फीट, 10 इंच है। इस मंदिराकार विरखम में गर्भगृह के स्थान पर 11 गुणा 10 इंच माप का गवाक्ष, जो मात्र 2 इंच गहराई का है, जिसमें कटि पर हाथ रखे स्त्री-पुरुष का चित्र उकेरा गया हैं। उत्तर से दूसरे स्थान पर स्थापित विरखम शीर्ष विहीन है। शीर्षाभाव के कारण इस विरखम की ऊँचाई मात्र 2 फीट, 9 इंच है। जबकि आधार का परिमाप 5 फीट, 4 इंच है। इस विरखम के 10 गुणा 8 इंच माप के गवाक्ष में भी स्त्री-पुरुष का चित्र उकेरा गया है। चित्र में पुरुष का दायां हाथ और स्त्री का बायां हाथ कटि पर तथा पुरुष का बायां और स्त्री का दायां ऊपर की ओर उठा है।

उत्तर से तीसरा और दक्षिण से दूसरा विरखम भी शीर्ष विहीन है। यह विरखम चारों में सबसे बड़ा विरखम है, जिसकी ऊँचाई 3 फीट, 4 इंच है और आधार का परिमाप 6 फीट है। इस विरखम के 12 गुणा 8 इंच माप के गवाक्ष में भी स्त्री-पुरुष का चित्र उकेरा गया है, जिनके हाथ कटि पर हैं। सबसे दक्षिणी विरखम भी शीर्ष विहीन है, जिसकी ऊँचाई 3 फीट और आधार का परिमाप 5 फीट, 3 इंच है। इस विरखम के 10 गुणा 7 इंच माप के गवाक्ष में स्त्री-पुरुष अपने हाथों को ऊपर की ओर खड़े किये हुए हैं। चारों विरखम 13 फीट, 2 इंच दूरी की लम्बाई में स्थापित हैं। उत्तर से दक्षिण की ओर पहले और दूसरे विरखम के मध्य 2 फीट, 6 इंच ; दूसरे और तीसरे विरखम के मध्य 1 फीट, 7 इंच और तीसरे और चौथे विरखम के मध्य 3 फीट, 6 इंच की दूरी है। इस विरखम परिसर में स्थापित प्रस्तर हवन कुण्ड 2 फीट, 3 इंच का वर्गाकार कुण्ड है, जिसकी गहराई 8 इंच है।

बिठोरिया के पर्वतपादीय विरखम परिसर में एक वृत्ताकार प्रस्तर भी है, जिसका व्यास 21 इंच और मोटाई 3 इंच है। पांचवां विरखम यहां से 100 मीटर दक्षिण में स्थापित भगवती मंदिर में है। बिठोरिया का भगवती मंदिर समुद्र सतह से 445 मीटर की ऊँचाई पर स्थापित है। शीर्ष विहीन मंदिर परिसर का यह विरखम 3 फीट, 1 इंच ऊँचा है। इसके आधार का परिमाप 4 फीट, 3 इंच है।

बिठोरिया, हल्द्वानी के पांचों विरखम अधिक प्राचीन प्रतीत नहीं होते हैं। कला की दृष्टि से त्रिरथ शैली मंदिर के प्रतिरूप हैं। मंदिराकृति के इन विरखमों में सैनिकों के स्थान पर स्त्री-पुरुष को नृत्य करते हुए दर्शाया गया है। ये विरखम शान्ति काल की ओर संकेत करते हैं। संभवतः ये विरखम चंद कालीन हैं और इनका निर्माण राजा रुद्रचंद के सम्पूर्ण कुमाऊँ का शासक बनने और चंद राज्य विस्तार के उपरांत किया गया। ऐतिहासिक महत्व के इन विरखमों को संरक्षण की आवश्यकता है।

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