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November 22, 2025December 10, 2025

सरयू और पूर्वी रामगंगा- गंगोली की नदियां

     कुमाऊँ का ‘गंगोली’ क्षेत्र एक विशिष्ट सांस्कृतिक और भौगोलिक क्षेत्र है। इस विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र को सरयू-पूर्वी रामगंगा का अंतस्थ क्षेत्र भी कह सकते हैं। वर्तमान में गंगोली का मध्य-पूर्व और दक्षिणी क्षेत्र पिथौरागढ़ तथा मध्य-पश्चिमी और उत्तरी क्षेत्र बागेश्वर जनपद में सम्मिलित है। गंगोली क्षेत्र पूर्व, पश्चिम और दक्षिण में दो नदियां सरयू और पूर्वी रामगंगा से घिरा है और इसके उत्तर में हिमालय है, जहाँ इन दोनों नदियों का उद्गम स्थल एक पर्वत श्रेणी की दक्षिणी पनढाल है, जो नंदाकोट के दक्षिण में है। इस पर्वत श्रेणी की उत्तरी पनढाल का जल पिण्डर नदी में गिरता है।

गंगावली

सरयू और पूर्वी रामगंगा नदियों के अंतस्थ क्षेत्र में भी नदियों की कतार है। इसलिए इस क्षेत्र को ‘गंगावली’ कहा गया। गंगोली की इन दो सीमावर्ती नदियों का पौराणिक महत्व तो है ही, साथ-साथ इनका इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और आर्थिक उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। गंगोली की नदी घाटियां में अनेक तटवर्ती मैदानों का विकास हुआ। कुमाउनी में नदी तटवर्ती मैदान को ‘बगड़’ और सिंचित भूमि को ‘सेरा’ कहते हैं

    कुमाऊँ की दो पौराणिक नदियां सरयू और पूर्वी रामगंगा चंद कालीन परगना गंगोली की सीमा निर्धारित करतीं थीं। सरयू और पूर्वी रामगंगा के उद्गम से संगम तक के अंतस्थ क्षेत्र को ‘गंगावली’ कहा जाता है। यह विशिष्ट क्षेत्र उत्तराखण्ड (मध्य हिमालय) के दो जनपदों पिथौरागढ़ तथा बागेश्वर के क्रमशः पश्चिम और पूर्व भाग में स्थित है। पिथौरागढ़ जनपद की गंगोलीहाट, गणाई, बेरीनाग और थल तहसील का रामगंगा से पश्चिमी भाग तथा बागेश्वर जनपद की काण्डा, दुग-नाकुरी और कपकोट तहसील का सरयू पूर्व क्षेत्र इस अंतस्थ क्षेत्र में सम्मिलित है। इस विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र के उत्तर में हिमालय, पूर्व में पिथौरागढ़, पश्चिम में बागेश्वर तथा दक्षिण में अल्मोड़ा और चम्पावत जनपद हैं। 

इतिहासकार बद्रीदत्त पाण्डे के अनुसार- ‘‘नदियां- सरयू, रामगंगा, नरगूल व पातालगंगा हैं। इसलिए इस परगने का नाम संस्कृत में गंगावली है अर्थात् गंगाओं की भूमि या दो गंगाओं के बीच की भूमि।’’ सम्भवतः गंगावली से गंगोली शब्द की व्युत्पत्ति हुई। यथा- गंगावली- गंगाउली- गंगौली-गंगोली। इसी प्रकार कुमाउनी में रावत-राउत-रौत की व्युत्पत्ति हुई। गंगोली के सीमांकन में चार भौगोलिक बिंदु, विशिष्ट सांस्कृतिक-धार्मिक प्रतीक के रूप में स्थापित हो चुके हैं। ये चार भौगोलिक बिंदु -उत्तर में सरयूमूल, पूर्व में बालीश्वर (थल), दक्षिण में रामेश्वर तथा पश्चिम में बागेश्वर। ये धार्मिक स्थल मध्य हिमालयी संस्कृति के ज्योति स्तम्भ हैं। सरयूमूल, बालीश्वर, रामेश्वर और बागेश्वर एक भौगोलिक चतुर्भुज निर्मित करते हैं, जिसका अंतस्थ भू-भाग ‘गंगोली’ है। 

उद्गम और संगम-  

    सरयू और पूर्वी रामगंगा ‘कफनी’ हिमनद के दक्षिण में स्थित पर्वत श्रेणी की दक्षिणी पनढाल की धाराओं से एक नदी स्वरूप धारण करती हुई पुनः रामेश्वर में एक हो जाती हैं। ‘‘नंदादेवी व उसके पड़ोसी नंदाकोट के शिखर और उसकी तलहटी से तीन नदियां निकलती हैं जो इस परगने के पूर्वी भाग को तीन अलग-अलग घाटियों में बांट देती हैं। इन नदियों के कारण इस परगने का मिजाज भी अलग तरह का है। ये तीन नदियां हैं- पिंडर, सरयू और पूर्वी रामगंगां।’’ सरयू और पूर्वी रामगंगा का उद्गम क्षेत्र नंदाकोट की तलहटी पर स्थित पर्वत श्रेणी है, जिस पर सरयूमूल नामक एक तीर्थ स्थल है। इस कारण इस पर्वत श्रेणी को सरयूमूल पर्वत श्रेणी कहते हैं। 

    बागेश्वर जनपद के पिण्डर और कफनी हिमनद से निकलीं जल धाराओं का प्रयाग द्वाली नामक घाटी स्थल पर होता है। प्रयाग स्थल द्वाली के दक्षिण में स्थित सरयूमूल पर्वत श्रेणी, जो उत्तर-पूर्व में कफनी हिमनद तक जाती है, एक धनुषाकार पर्वत श्रेणी है। इस धनुषाकार पर्वत श्रेणी को, दक्षिण की ओर सुमगढ़ तक जाती एक पर्वत श्रेणी द्विभाजित करती है और जिसके पूर्वी पनढाल का जल रामगंगा और पश्चिमी पनढाल का जल सरयू में गिरता है। सुमगढ़ एक पौराणिक स्थल है, जिसे शुम्भ-निशुम्भ नामक राक्षसों और चामुण्डा के मध्य हुए युद्ध भूमि के नाम से जाना जाता है। पूर्वी रामगंगा के समानान्तर पूर्व में नामिक पर्वत श्रेणी है, जिस पर नामिक हिमनद है। यह पर्वत श्रेणी पूर्वी रामगंगा के समानान्तर तेजम नामक स्थल तक जाती है। नामिक पर्वत श्रेणी की पश्चिमी पनढाल का जल पूर्वी रामगंगा में गिरता है। इसी पनढाल पर तेजम के उत्तर में होकरा नामक गांव में होकरादेवी का प्रसि़द्ध मंदिर है।

    सरयूमूल पहुँचने हेतु प्रमुख मार्ग भराड़ी (कपकोट) से होकर जाता है। सरयूमूल में जल स्रोत्र क्षेत्र की चौड़ाई लगभग 4-6 किलोमीटर विस्तृत है। समुद्र सतह से सरयूमूल पर्वत की ऊँचाई अनुमानित 2000 मीटर है। इस पर्वत श्रेणी के उत्तर-पूर्वी भाग से रामगंगा तथा दक्षिण-पश्चिमी भाग से सरयू नदी निकलती है। सरयूमूल को स्थानीय लोग सयूरगुल और ‘सहस्रधारा’ भी कहते हैं। ‘सहस्रधारा’ संस्कृत का स्त्रीलिंग शब्द है, जिसका अर्थ- ‘‘देवताओं को स्नान कराने का हजार छिद्रों का एक पात्र।’’ सहस्रधारा से निकली हजारां लघु धाराओं से सरयू और पूर्वी रामगंगा उद्भव हुआ है। ‘‘स्कन्द मानसखण्ड के अध्याय 74 में उल्लेख मिलता है- वशिष्ठ जी द्वारा भगवान विष्णु की स्तुति कर मानस क्षेत्र से लायी गयी पुण्य नदी सरयू को लोक हित की कामना से वशिष्ठ ऋषि ने प्रवाहित किया।’’

वसिष्ठोऽपि महाभागाः प्राप्य तां सरयूं शुभाम्

मानवानां  हितार्थाय वाहयामास तां  नदीम् ।  (74/94)

    बागेश्वर ‘‘जिला मुख्यालय से लगभग 55 कि.मी. की दूरी पर कपकोट तहसील का अंतिम गांव झूनी है। इस गांव के सामने की पहाड़ी से सरयू नदी उद्गमित है। सरयू के उद्गम स्थल तक पहुँचने के लिए 40 कि. मी. मुनारगांव तक सड़क मार्ग है। अपै्रल माह के बैशाख पूर्णिमा को सरयू मंदिर में भव्य मेला लगता है।’’ सरयूमूल पर्वत श्रेणी का पश्चिमी भाग सरयू तीर्थ के रूप में विकसित हो चुका है, जहाँ वैशाख पूर्णिमा के अवसर पर विशेष पूजा की जाती है। थल के बालीश्वर और गंगोलीहाट के रामेश्वर तीर्थ में भी वैशाख प्रतिपदा एवं शिवरात्रि पर्व पर पूजा-पाठ और मेला आयोजित किया जाता है। जबकि बागेश्वर में शिवरात्रि एवं मकर संक्रांति पर मेला आयोजित किया जाता है।

सरयू और पूर्वी रामगंगा का संगम रामेश्वर तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध है। रामेश्वर तीर्थ स्थल, गंगोलीहाट तहसील के दक्षिण-पूर्व में है। इस स्थान पर उत्तर से बहती हुई वेगवती पूर्वी रामगंगा तथा पश्चिम से मंद गति से बहते हुई सरयू नदी एक दूसरे से न्यूनकोण की स्थिति में अभिन्न होती है। रामेश्वर की समुद्र सतह से ऊँचाई 497 मीटर है और यह तीर्थ स्थल 29° 31’ 28’’ उत्तरी अक्षांश रेखा तथा 80° 06’ 08’’ पूवी देशांतर रेखा पर स्थित है। यह तीर्थ स्थल पिथौरागढ़ से 30 और गंगोलीहाट से 25 किलोमीटर दूर है। इस पावन घाट के निकट दक्षिण में बौतड़ी गांव, चम्पावत (सरयू तट) और पूर्व में खूंट गांव, पिथौरागढ़ (रामगंगा तट) है। बौतड़ी गांव में सन् 1682 को बैशाखी मेले पर चंद राजा उद्योतचंद अपने मंत्री मण्डल सहित पहुँचे थे। इस पर्व पर उन्होंने मंदिर की व्यवस्था हेतु एक ताम्रपत्र शाके 1604 निर्गत किया, जिसे रामेश्वर मंदिर का वार्षिक आय-व्यय पंचांग कह सकते हैं।

नदियां-

सरयू और पूर्वी रामगंगा ‘गंगावली’ की सीमावर्ती नदियां हैं। इन दो नदियों के अतिरिक्त इस क्षेत्र की प्रमुख नदियां- पूंगर, मरगड़ी, बरड़ और कुलूर हैं। ‘‘पूंगर नदी का उद्गम स्थल सनगाड़ गांव के डोर नामक स्थान पर है।’’ यह नदी सेराओं का निर्माण करते हुए बालीघाट में सरयू से संगम करती है। मरगड़ी नदी का उद्गम शिखर-भनार पर्वत का पूर्वी ढाल है और पूर्वी रामगंगा से इस नदी का संगम नाचनी के पास चिल्का-भकन नामक स्थान पर होता है। पुंगराऊँ घाटी में बगड़ नदी चौकोड़ी-कोटमन्या की पहाड़ियों से निकल कर थल में पूर्वी रामगंगा से संगम करती है, जहाँ पूर्वी रामगंगा के पूर्वी तट पर प्रसिद्ध तीर्थ बालीश्वर है। यह नदी पुंगराऊँ घाटी के बौगाड़ गांव की भूमि को उपजाऊ बनाती है और इसकी सहायक नदियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में गाड़ कहा जाता है, बड़ी संख्या में घराटों के लिए प्रसिद्ध है। कमस्यार घाटी में कुलूर नदी काण्डा की पहाड़ियों से निकलती है और सेराघाट के निकट सरयू में समाहित होती है। 

 सरयू नदी –

सरयू नदी का उद्गम सरयूमूल है, जिसे सहस्र धारा भी कहा जाता है। लगभग 140 वर्ष पहले ब्रिटिश शासन काल में हिमालियन गजेटियर के लेखक एडविन थॉमस एटकिंसन ने इस नदी का विवरण इस प्रकार दिया है-

‘ ‘इसका स्रोत 80° 06’ 50’’ अक्षांश और 30° 01’ 30’’ देशांतर पूर्व में एक घाटी में है जिसमें झुंडी गांव बसा है। स्रोत से आठ मील दूर सुपी में इसकी चौड़ाई पंद्रह गज है तथा मई महीने में यहाँ केवल दो फीट पानी रहता है। सुपी से कुछ मील नीचे नदी का प्रवाह-विस्तार संकरा होकर बारह गज रह जाता है और गहराई चौबीस इंच है तथा कुछ और नीचे या स्रोत से पंद्रह मील दूर यह पैंतालीस गज चौड़ी और सत्ताइस इंच गहरी है। कई छोटी-मोटी सरिताओं को समेटते हुए 29° 59’ अक्षांश और 77° 59’ देशांतर पर तल्ला दानपुर पट्टी में प्रवेश करती है। यहाँ इसके दायें किनारे से कनलगाड़ मिलती है और कुछ दूर नीचे की ओर यानी स्रोत से इकत्तीस मील दूर पुंगरगाड़ इसमें समाहित होती है।

करीब एक मील नीचे मल्ला कत्यूर पट्टी से आ रही लहोरगाड़ इसके दायें किनारे से मिलती है। यहाँ से दक्षिण-पूर्व को मुड़कर चार मील नीचे बागेश्वर पहुँचती है जहाँ समुद्र सतह से 3,143 फीट की ऊँचाई पर गुमती या गोमती नदी इसके दायें किनारे से मिलती है। सरयू के गोमती के संगम के पैंतीस मील नीचे यह दायें किनारे से पनार नदी को साथ लेती है तथा तीन मील और नीचे रामेश्वर में रामगंगा पूर्वी को अपने बायें किनारे से समेटती है। यह संगम 29° 31’ 25’’ अक्षांश और 80° 09’ 40’’ देशांतर पर समुद्र-सतह से 1,500 फीट की ऊँचाई पर है।’’

पूर्वी रामगंगा नदी –

पूर्वी रामगंगा नदी सरयूमूल पर्वत श्रेणी के उत्तर-पूर्वी छोर से निकलती है। हिमालियन गजेटियर के लेखक एडविन थॉमस एटकिंसन ने इस नदी का विवरण इस प्रकार से किया है-

‘ ‘रामगंगा पूर्वी, एक नदी जिसका स्रोत कुमाऊँ की बिचला दानपुर पट्टी में है। यह नदी घोड़े की नाल सदृश मार्ग से पहाड़ पर उतरती है। दक्षिण में रामगंगा बिचला दानपुर और तल्लादेश के बीच सीमा का काम करती है। आगे दक्षिण में यह गंगोली की पुंगरांव और बड़ाऊँ तथा सीरा की माली पट्टी के बीच सीमा तय करती है। और आगे जाकर यह बायें तट से बारबीसी, सेठी तल्ला, वाल्दिया-मल्ला और रावल तथा दायें तट पर गंगोली के बेल की सीमा निर्धारित करती है। रामगंगा नाम रामेश्वर में सरयू और रामगंगा के संगम के बाद संयुक्त नदी को दिया जाता है और यह नाम पंचेश्वर तक रहता है जहाँ यह नदी काली नदी से मिलती है।’’

स्कंद पुराण के ‘‘मानसखण्ड में इस नदी को हिमालय के एक प्रान्त में परशुराम द्वारा प्रवाहित और विशिष्ठ आश्रम के समीप सरयू में संगमित होने वाली नदी कहा गया है।’’ गंगोली के रामेश्वर को स्कन्द पुराण के मानसखण्ड में विशिष्ठ मनु का आश्रम कहा गया है। 

सरयू-पूर्वी रामगंगा अंतस्थ क्षेत्र में नदी घाटियों के तटवर्ती उपजाऊ ‘‘जल-सिंचित जमीनों को सेरा कहते हैं।’’ पर्वतीय क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाओं का विकास नदी, गाड़-गधेरो के जल से हो पाया है। अतः पर्वतीय क्षेत्रों में सिंचित कृषि भूमि का उत्तरोत्तर विकास नदी घाटियों में ही सम्भव हो पाया।

ऐतिहासिक उत्तर कत्यूरी और चंद ताम्रपत्रों में नदी तटवर्ती भूमि के लिए ‘बगड़’ शब्द प्रयुक्त किया गया है। पिथौरागढ़ के मझेड़ा चण्डाक से प्राप्त ताम्रपत्र शाके 1349 (सन् 1427 ई.) में ‘‘गाड कि बगड़ि’’ वाक्यांश उत्कीर्ण है। ‘बगडि’ या बगड़ का अर्थ ‘तटवर्ती मैदान’ है। चंद शासक कल्याणचंददेव के ‘‘गौंछ ताम्रपत्र शाके 1478’’ (सन् 1556 ई.) में भी ‘बगड़’ शब्द प्रयुक्त किया गया। सोर-बम, सीरा-मल्ल और अस्कोट-पाल, गंगोली-रजवार और चंद शासकों ने भी नदी तटवर्ती समतल भूमि हेतु ताम्रपत्रों में ‘बगड़’ शब्द प्रयुक्त किया। हिंदी शब्द कोश में नदी तटवर्ती भूमि हेतु ‘बगड’़ के स्थान पर ‘बांगर’ शब्द उल्लेखित है। बगड़ या बांगर के स्थान पर ‘सेरा’ शब्द कब से प्रयोग में लाया गया ? यह गहन शोध का विषय है।  

सेरा-

सरयू नदी बागेश्वर और सेराघाट नामक स्थान पर कम्रशः मण्डलसेरा और ‘सेरा’ का निर्माण करती है। बागेश्वर और सेराघाट (जनपद पिथौरागढ़) में सरयू नदी, अंग्रेजी का एल आकृति बनाते हुए बायें मुड़ जाती है और नदी के बायें तट पर क्रमशः मण्डलसेरा और सेराघाट समतल भूमि का निर्माण होता है। सरयू नदी रामेश्वर में जब पूर्वी रामगंगा से संगम करती है तो दायें मुड़ कर एल आकृति बनाती है। अतः यहाँ नदी के दायें तट पर उपजाऊ बौतड़ी गांव (जनपद चम्पावत) का निर्माण हुआ। तीनों ही स्थानों पर सरयू नदी उपजाऊ भूमि का निर्माण करती है, जिनमें से दो सेरा (मण्डल सेरा और सेराघाट) सरयू-पूर्वी रामगंगा अंतस्थ क्षेत्र में स्थित हैं।

सरयू के बहाव के विपरीत पूर्वी रामगंगा का बहाव तीव्र है। अतः इस नदी घाटी में विशाल सेराओं का निर्माण नहीं हो पाया। पूर्वी रामगंगा अपने तीव्र बहाव के कारण लघु-निक्षेपों का निर्माण करने में सफल रही है। उदाहरण के लिए पूर्वी रामगंगा के पूर्वी तट पर तेजम, गौचर, थल जैसे समानान्तर लघु समतल भूमि का निर्माण हो पाया।

सरयू और पूर्वी रामगंगा की सहायक नदियां भी सरयू-पूर्वी रामगंगा अंतस्थ क्षेत्र में अनेक सेराओं का निर्माण करतीं हैं। सरयू की सहायक कुलूर नदी- धपोलासेरा, रावतसेरा, कपूरी, खातीगांव तथा बांसपटाण आदि स्थानों में प्रसिद्ध सेराओं का निर्माण करती हुई सेराघाट के निकट सरयू से संगम करती है। सरयू की की एक अन्य सहायक पूंगर नदी जलमाली, भूलीगांव, होराली, बनलेख आदि स्थानों में सेराओं का निर्माण कर बालीघाट के पास सरयू में समाहित हो जाती है। पूर्वी रामगंगा की सहायक मरगड़ी नदी माजखेत और चेटाबगड़ में सेरा का निर्माण करती है। पूर्वी रामगंगा की एक अन्य सहायक बरड़ नदी की लघु धाराएं बौंगाड़ में सेराओं का निर्माण करतीं हैं। उपजाओं भूमि के कारण ये नदी तटवर्ती क्षेत्र प्राचीन काल से भोट व्यापार के पड़ाव रहे थे, जहाँ से भोट व्यापारी ऊनी वस्त्रों के बदले अनाज ले जाते थे। 

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थल का शिवालय
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थल का एक हथिया देवल  

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