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November 26, 2025December 9, 2025

किरौली ताम्रपत्र- गंगोली के रजवार

किरौली ताम्रपत्र का संबंध गंगोली राज्य के रजवार शासकों से था। उत्तराखण्ड का प्राचीन कत्यूरी राज्य तेरहवीं शताब्दी में क्षेत्रीय राज्यों में विभाजित हो गया था। इनमें से एक राज्य सरयू-पूर्वी रामगंगा अंतस्थ क्षेत्र में स्थित था, जिसे ‘गंगावली’ या ‘गंगोली’ कहा गया। प्राचीन गंगोली राज्य नाग मंदिरों के लिए प्रसिद्ध था। इस क्षेत्र विशेष में कालीनाग, पिंगलीनाग, बेड़ीनाग, धौलीनाग, फेणीनाग, हरीनाग और वासुकिनाग के प्रसिद्ध नाग मंदिर हैं। गंगोली के गणाई-गंगोली, बेरीनाग और कपकोट तहसील में वासुकिनाग का एक-एक मंदिर है। बेरीनाग तहसील में स्थित लोहाथल वासुकि नाग मंदिर के अतिरिक्त सभी नाग मंदिर गंगोली के ऊँचे पर्वतों पर तथा शेषनाग प्राकृतिक रुप में पाताल भुवनेश्वर गुहा में स्थापित हैं।

बेड़ीनाग का मंदिर जिस पर्वत पर है, उसके उत्तरी पनढाल पर बेरीनाग नगर का विकास ब्रिटिश काल में आरंभ हुआ था। इससे पूर्व, बेरीनाग के आस पास का क्षेत्र बड़ाऊँ नाम से जाना जाता था। संभवतः बेड़ीनाग से बड़ाऊँ शब्द की व्युत्पत्ति हुई, जहाँ अंतिम अक्षर ‘ऊँ’ शिवत्व का प्रतीक ऊँ पर्वत को अभिव्यक्त करता है। बड़ाऊँ के किरौली गांव से ही रजवार शासक आनन्दचंद रजवार का ताम्रपत्र प्राप्त हुआ, जिसे किरौली ताम्रपत्र कहा जाता है। 

किरौली गांव-

        किरौली ताम्रपत्र, राजाधिराज आनन्द रजवार द्वारा केशव पंत को पूजा-पाठ हेतु प्रदान किया गया था। ताम्रपत्र में उल्लेखित केराउलि गांव को अब किरौली कहते हैं, जो वर्तमान में विशुद्ध रूप से पंत ब्राह्मणों का गांव है। यह ताम्रपत्रीय गांव बेरीनाग से 13 किलोमीटर दूर उडियारी-थल मार्ग (राज्य मार्ग-11) पर स्थित है, जिसके उत्तर में स्थित पर्वत श्रेणी लम्बवत् में चौकोड़ी से थल तक विस्तृत है। हिमालयन गजेटियर के लेखक एडविन थॉमस एटकिंसन ने इस पर्वत श्रेणी के उच्च शिखर को ‘खमलेख’ कहा था। इस पर्वत श्रेणी के उत्तर में पुंगराऊँ तथा दक्षिण में बड़ाऊँ क्षेत्र है।

बड़ाऊँ की प्रमुख नदी गुरघट्टी है, जिस पर एक जल प्रपात है, जिसे कुमाउनी में छीड़ा कहते हैं। यह जल प्रपात 29° 46‘ 56‘‘ उत्तरी अक्षांश और 80° 01‘ 07‘‘ पूर्वी देशांतर रेखा पर स्थित है। छीड़ा जल प्रपात के दक्षिण में गराऊँ गांव है, जिसे विद्वान चंद राजा रुद्रचंद के सेनापति पुरुषोत्तम पंत के गांव से संबद्ध करते हैं। छीड़ा जल प्रपात के उत्तर में काण्डे तथा खमलेख पर्वत के दक्षिणी पनढाल पर किरौली गांव स्थित है, जो 29° 49‘ 38‘‘ उत्तरी अक्षांश तथा 80° 03‘ 01‘‘ पूर्वी देशांतर रेखा पर स्थित है।

        किरौली गांव के दक्षिण में काण्डे गांव है। राज्य मार्ग 11 इन दोनों गांवों की सीमा को निर्धारित करता है। पिथौरागढ़ जनपद में किरौली नाम के अन्य गांव भी हैं। इसलिए बड़ाऊँ के किरौली गांव को काण्डे-किरौली कहा जाता है। काण्डे के अतिरिक्त किरौली के पड़ोस में जाख रावत, मनेत, जगथली और उडयारी आदि गांव हैं। किरौली के पूर्व में जाख रावत, पश्चिम में उडयारी और दक्षिण पूर्व में मनेत और जगथली गांव स्थित हैं। इन गांवों के अतिरिक्त शिखर पर्वत (खमलेख) के दक्षिणी पनढाल और गुरघट्टी नदी के मध्य में गुरबूरानी, कालेटी, लालुका और वर्षायत गांव स्थित हैं।

सम्पूर्ण रूप में यह क्षेत्र ‘नौगांव-ग्यारहपाली‘ कहलाता था। संख्या आधारित एक गांव पन्द्रपाली बागेश्वर के निकट है। गांव हेतु पाली या पल्लिका का उल्लेख ब्रह्मपुर के छठी शताब्दी के पौरव ताम्रपत्रों से भी प्राप्त होता है। ‘पल्लिका’ संस्कृत शब्द है, जिससे कुमाउनी में पाली शब्द की व्युत्पत्ति हुई। अतः बेरीनाग क्षेत्र का इतिहास किरौली ताम्रपत्र से भी 1000 वर्ष प्राचीन है।

        पूजा-पाठ हेतु किरौली के निकट और जाख रावत के उत्तर में पिंगली नाग देवता शिखर पर्वत (खमलेख) पर फुटलिंग के रूप में विराजमान हैं। यह मंदिर 29° 48‘ 50‘‘ उत्तरी अक्षांश और 80° 03‘ 02‘‘ पूर्वी देशांतर रेखा तथा समुद्र सतह से लगभग 2000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जहाँ से हिमालय के दिव्य दर्शन होते हैं। पूजा-पाठ हेतु निर्गत किरौली ताम्रपत्र के अनुक्रम में इस गांव के पंत ब्राह्मण सैकड़ों वर्षों से पिंगली नाग देवता के प्रधान पुजारी का कार्य सम्भाले हुए हैं। शिखर पर्वत पिंगली नाग के मुख्य मंदिर के अतिरिक्त हीपा, वर्षायत, जाख रावत, कणखेत और जाख रावत वन भूमि में भी पिंगली नाग के उप मंदिर स्थापित हो चुके हैं। हीपा का पिंगली नाग मंदिर पुंगराऊँ क्षेत्र में स्थित है, जिसे पिंगली नाग की रानी कहा जाता है।

जाख रावत पिंगली नाग

किरौली ताम्रपत्र की प्रतिलिपि-

                 (राज्य चिह्न की वृत्ताकार छाप)

              श्रीशाके1519मासानीवैसाषदीन7गते

             सोमवासोश्रीराजाधिराजआनन्दचन्दरज्वारज्यूलेबड़ा

             उमाजकेराउलिगाउकेशवपंतदीनुकेशवपंतलेपाया

              द..कैदिनुदेउलपुजकिपाठिकैपायोकेराउलिगाउ

              लागदिगाउबगड़िलेकइजरिरौतकैपायोसर्वकरअक

              रोसर्वदोषनिर्दोषकैयोशाषिनराइणगुशाइपिरुगु

              शाईखड़कुगुशाईचारचौधरिकपुरुविष्टशालि

               वाणवाफिलोकेदकार्किशुर्त्ताणकार्किशुभम्

              भूमियःप्रतिगृहणातियश्चभूमिप्रयछति।उभौतौ 

               पुण्यकर्माणौनियतंस्वर्गागानिनौ।।

    राज्य चिह्न के नीचे और ताम्रपत्र के बायें पार्श्व में उत्कीर्ण पंक्ति- 

              लिषितेवैकुण्ठपंडितेन।।

किरौली ताम्रपत्र का पंक्तिबद्ध पाठ-

              श्री शाके 1519 मासानि वैशाख 7 गते

              सोमवासो श्री राजाधिराज आनन्द चन्द रज्वार ज्यू बड़ा-

              -उ माज केराउलि गाउ केशव पंत दीनु केशव पंत ले पाया

              द..कै दिनु देउल पुज कि पाठि कै पायो केराउलि गाउ

              लागदि गाउ बगड़ि लेक इजरि रौत कै पायो सर्वकर अक-

             -रो सर्वदोष निर्दोष के यो साखि नराइण गुशाई पिरु गु-

             -शाई खड़कु गुशाई चार चौधरिक पुरु बिष्ट शालि-

              -वाण वाफिलो केद कार्की सुर्त्ताण कार्की ’’शुभम्’’

              भूमि यः प्रतिगृहणाति यश्च भूमि प्रयछति।

              उभौ तौ पुण्य कर्माणौ नियतं स्वर्गा गानिनौ।।

      राज्य चिह्न के नीचे और ताम्रपत्र के बायें पार्श्व में उत्कीर्ण पंक्ति- 

              लिखिते वैकुण्ठ पंडितेन।।

किरौली ताम्रपत्र का अनुवाद-

        श्री शाके 1597, बैशाख मास की 7 गते सोमवार को श्री राजाधिराज आनन्दचंद रज्वार ज्यू ने बड़ाऊँ क्षेत्र के किरौली गांव को केशव पंत को दिया। केशव पंत ने द…..के दिन पूजा-पाठ के लिए किरौली गांव और लागदि गांव बगड (नदी तटवर्ती समतल भूमि), लेक (पर्वतीय भूमि) और इजर (पर्वतीय वन भूमि घास हेतु) सहित रौत (जागीर) में प्राप्त किया। यह भूमि सर्वकर, अकर, सर्वदोष, निर्दोष से मुक्त प्राप्त की। इस भूमिदान के साक्षी- नारायण गुसाईं, पीरू गुसाईं, खड़कू गुसाईं तथा चार चौधरी- पीरु बिष्ट, शालिवाण बाफिला, केद कार्की और शुर्त्ताण कार्की का शुभ हो। 

        इस ताम्रपत्र में उल्लेखित संस्कृत श्लोक का भावार्थ- ‘‘जो भूमि को प्राप्त करता है और जो भूमि को देता है। वे दोनों ही पुण्य कर्मों वाले हैं और निश्चय ही स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।’’

        इस ताम्रपत्र को वैकुण्ड पंडित ने लिखा।

✐ डॉ. नरसिंह 

 किरौली ताम्रपत्र

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