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November 24, 2025December 12, 2025

कार्तिकेयपुर राज्य और त्रिकोणीय संघर्ष

कार्तिकेयपुर, उत्तराखण्ड का एक प्राचीन राज्य नगर था, जिसकी पहचान विद्वान बागेश्वर जनपद के बैद्यनाथ से करते हैं।कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव और पद्मटदेव के ताम्रपत्रों का आरंभिक वाक्यांश ‘स्वस्ति श्रीमान कार्तिकेयपुर’ से ही आरंभ किया गया है। इसलिए इन ताम्रपत्रों को कार्तिकेयपुर ताम्रपत्र भी कहते हैं। इन ताम्रपत्रों में ललितशूरदेव की वंशावली ‘निम्बर’ और पद्मटदेव की ‘सलोणादित्य’ से उत्कीर्ण की गयी है। लेकिन पद्मटदेव के पुत्र सुभिक्षराजदेव ने नवीन राज्य नगर सुभिक्षुपुर की स्थापना की थी, जिसका उल्लेख उसने ताम्रपत्र में कार्तिकेयपुर के स्थान पर किया। यही कारण है कि ललितशूरदेव के राज्य काल को पद्मटदेव से पूर्ववर्ती कालखण्ड में निर्धारित किया गया।

      अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर निम्बर वंश का अंतिम राजा भूदेवदेव था, जिसकी पुष्टि बागेश्वर शिलालेख करता है। इस वंश में निम्बर के पश्चात क्रमशः इष्टगणदेव, ललितशूरदेव और भूदेवदेव हुए। निम्बर के अतिरिक्त इष्टगणदेव, ललितशूरदेव और भूदेवदेव द्वारा ’परमब्राह्मणपरायण’ की उपाधि धारण करना, कार्तिकेयपुर राज्य पर ब्राह्मण धर्म के प्रभाव को परिलक्षित करता है।

1- ब्राह्मण धर्म संरक्षक कार्तिकेयपुर राज्य-

ब्राह्मण धर्म का संरक्षक कार्तिकेयपुर राज्य नौवीं शताब्दी में शंकराचार्य के कार्योन्नति में सहायक सिद्ध हुआ। शंकर का जन्म सन् 788 ई. में सदूर दक्षिणी राज्य केरल के कालड़ी ग्राम में हुआ था। वेदोपनिषद् का ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत उन्होंने लगभग नौ वर्ष की आयु में गृह त्याग दिया था। 32 वर्ष की आयु में केदार समाधि लेने से पूर्व वह उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भारत भूमि पर अपने पवित्र पाद चिह्नों की अमिट छाप छोड़ने में सफल हुए। भारत भ्रमण के कालचक्र में उन्होंने सनातन धर्म की ज्योति को बारह ज्योतिर्लिंगों में परिवर्तित कर अखण्ड भारत की अमर ज्येति बना दिया।

उत्तराखण्ड के ब्रदीनाथ, केदारनाथ, गंगोलीहाट के प्राचीन मंदिरों में इन्होंने सनातन धर्म के कीर्ति ध्वज को फहराया। ब्राह्मणवादी राज्य कार्तिकेयपुर सदैव उनको राजकीय सहयोग हेतु सक्रिय रहता था। अन्याथा इस राज्य के राजकीय सहयोग के बिना सदूर दक्षिण के नंबूदिरी रावल ब्राह्मण बद्रीनाथ और केदारनाथ मंदिर के प्रधान पुजारी नहीं बन सकते थे। गंगोलीहाट के महाकाली मंदिर के पूजा-प्रबंधक का कार्य क्षत्रिय करते हैं, जिनकी जाति भी ‘रावल’ ही है।

2- आठवीं शताब्दी में कार्तिकेयपुर राज्य और कन्नौज-

कार्तिकेयपुर के निंबर वंश में इष्टगणदेव, ललितशूरदेव और भूदेवदेव ने ’परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी, जो उनके स्वतंत्र शासक होने का प्रमाण है। जबकि इस वंश के मूल पुरुष ’निम्बर’ उपाधि रहित राजा थे। अतः राजा निम्बर एक अधीनस्थ शासक थे। आठवीं शताब्दी में कार्तिकेयपुर का निकटवर्ती शक्तिशाली राज्य कन्नौज था। हर्ष के पश्चात कन्नौज का शक्तिशाली शासक यशोवर्मन था। ‘‘राजतरंगिणी में काव्यात्मक ढंग से कहा गया है कि वाक्पति, भवभूति आदि कवियों द्वारा सेवित यशोवर्मा उसका (ललितादित्य का) गुणगान करने लगा तथा यमुना से लेकर कालिक (काली नदी) तक के बीच का कन्नौज राज्य का भाग ललितादित्य के महल का आंगन बन गया।’’ 

3- कश्मीर नरेश ललितादित्य का प्रभाव-

       हर्ष के पश्चात आठवीं शताब्दी में उत्तराखण्ड पर यशोवर्मन के नेतृत्व में पुनः कन्नौज का नियंत्रण स्थापित हो चुका था। ‘‘यशोवर्मन ने सम्भवतः 700 ई. से 740 ई. तक राज्य किया।’’ कल्हण के अनुसार कश्मीर नरेश ललितादित्य मुक्तापीड ने यशोवर्मन को पराजित कर उत्तराखण्ड के काली नदी तक अपने राज्य का विस्तार कर लिया था। संभवतः 740 ई. में ललितादित्य ने यशोवर्मन को पराजित किया और कार्तिकेयपुर राज्य ’निम्बर’ को सौंप दिया। कश्मीर शासक ललितादित्य का प्रभाव निम्बर के पौत्र ललितशूरदेव के नामकरण में दिखलाई देता है।

कश्मीर के शासकों में कार्कोटिक वंश का ललितादित्य मुक्तपीड (लगभग 724-760 ई.) सर्वाधिक शक्तिशाली राजा सिद्ध हुआ। बारहवीं शताब्दी के कश्मीरी इतिहासकार कल्हण ने राजतरंगिणी में इस राजा को महान साम्राज्यवादी बतलाया, जिसने उत्तर में तिब्बत, दक्षिण में कावेरी और पूर्व में बंगाल तक अपना सफल सैन्य अभियान चलाया था। मुक्तापीड की मृत्यु के बाद उसके वंश की अवनति प्रारम्भ हो गयी थी। कार्तिकेयपुर में निम्बर ने लगभग 740 से 760 ई. तक ललितादित्य के एक अधीनस्थ शासक के रूप में राज्य किया। अभिलेखों के अनुसार निम्बर के उपरांत उसके पुत्र इष्टगणदेव ने ’परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी। इष्टगणदेव यह उपाधि कश्मीर शासक ललितादित्य मुक्तापीड की मृत्यु के उपरांत ही धारण कर सकता था। 

4- कार्तिकेयपुर का प्रथम शासक इष्टगणदेव-

       यदि इष्टगणदेव ने लगभग 20-30 वर्षों तक राज्य किया तो, लगभग 780 से 790 ई. के आस पास ललितशूरदेव ने उत्तराधिकार में कार्तिकेयपुर राज्य की सत्ता प्राप्त कर ली थी। लेकिन ‘‘प्रो. कीलहॉर्न ने ललितशूरदेव के 21 वें वर्ष के ताम्रपत्राभिलेख का सम्पादन करते समय ज्योतिष के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि इस दानपत्र की तिथि 22 दि. 853 ई. होगी। उसके अनुसार, लिपि के आधार पर भी यही काल निश्चित होता है।’’ प्रो. कीलहॉर्न के मत को मान्य करे तो, कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव का राज्यारोहण वर्ष 832 ई. निर्धारित होता है। मेरा विश्लेषण मुख्यतः कश्मीर शासक ललितादित्य द्वारा उत्तराखण्ड पर अधिकार और निम्बर का एक अधीनस्थ शासक होने से संबंधित है, जो प्रो. कीलहॉर्न की तिथि गणना के आस पास ही है।

5- त्रिकोणीय संघर्ष-

       राष्ट्रीय परिपेक्ष्य पर ध्यान दें तो, आठवीं शताब्दी का अंतिम चतुर्थांश और नौवीं शताब्दी का इतिहास कन्नौज पर अधिकार हेतु हुए त्रिकोणीय संघर्ष का इतिहास था। कन्नौज पर अधिकार हेतु इस त्रिकोणीय संघर्ष में बंगाल के पाल, मध्य भारत के गुर्जर-प्रतिहार और दक्षिण के राष्ट्रकूट राजवंश ने प्रतिभाग किया था। इस त्रिकोणीय संघर्ष में सर्वप्रथम गुर्जर-प्रतिहार शासक वत्सराज (775-800 ई.) ने पाल शासक धर्मपाल (770-810 ई.) को पराजित कर कन्नौज पर शासन हेतु इन्द्रायुध को मनोनित किया। राष्ट्रकूट ध्रुव (780-793 ई.) ने लगभग सन् 786 ई. में उत्तर भारत की राजनीति में हस्तक्षेप किया। राधनपुर लेखानुसार उसने ‘‘वत्सराज के यश के साथ-साथ उन दोनों राजछत्रों को भी छीन लिया जिन्हें उसने गौड़ नरेश से लिया था’’ इस पराजय के साथ वत्सराज राजपूताना के रेगीस्तान में भाग गया। संजन लेखानुसर ध्रुव ने गौड़ नरेश धर्मपाल को भी पराजित किया। ध्रुव का उद्देश्य कन्नौज पर अधिकार करना नहीं था। वह शीघ्र दक्षिण को लौट गया।

       ध्रुव के लौटते ही धर्मपाल ने कन्नौज राजा इन्द्रायुध को हराकर राजसिंहासन पर चक्रायुध को आसित कर दिया। कन्नौज में उसने एक राज सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें ‘‘भोज, मत्स्य, मद्र, कुरु, यदु, यवन, अवन्ति, गंधार तथा कीर के शासकां ने भाग लिया।’’ संभवतः इसी समय उत्तराखण्ड के कार्तिकेयपुर नरेश धर्मपाल के सम्पर्क में आये। ‘‘ग्यारहवीं शती के गुजराती कवि सोड्ढल ने धर्मपाल को उत्तरापथस्वामी की उपाधि से सम्बोधित किया है।’’ अतः त्रिकोणीय संघर्ष का पहला चरण सन् 775 से 793 ई. के मध्य रहा था।

     पाल वंश का प्रथम शासक गोपाल था, जिसने लगभग 750 ई. से 770 ई. तक शासन किया। उसके पश्चात उसका पुत्र धर्मपाल (770-810 ई.) राजा हुआ। खालीमपुर लेख में उसे (धर्मपाल) सभी सम्प्रदायों विशेष रूप से ब्राह्मणों का आदर करने वाला कहा गया है। यह पाल शासक आदि गुरु शंकराचार्य का समकालीन था। अतः उसका एक बौद्ध शासक के रूप में ’ब्राह्मणपरायण’ होना शंकराचार्य के प्रभाव को परिलक्षित करता है। उसने भगवान मन्ननारायण के मंदिर के निर्वाह हेतु चार गांव दान में दिये थे। बंगाल के इस शासक ने कार्तिकेयपुर नरेशों की भाँति ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की थी।

       पंडित बद्रीदत्त पाण्डे लिखते हैं- ’’वह केदारनाथ गये थे।’’ लेकिन डॉ. शिप्रसाद डबराल मुंगेर-देवपाल अभिलेख के अनुसार लिखते हैं- ’’दिग्विजय में प्रवृत्त उस नरेश धर्मपाल (827-867 वि.) के भृत्यवर्ग ने केदारतीर्थ में यथाविधि स्नान-तर्पणादि सम्पन्न किये।’’ केदार यात्रा के आधार पर कह सकते हैं कि धर्मपाल का उत्तराखण्ड के कार्तिकेयपुर राज्य से मैत्रीपूर्ण संबंध था। संभवतः इस सफल यात्रा की पृष्ठभूमि में प्रछन्न बौद्ध (शंकराचार्य), धर्मपाल और कार्तिकेयपुर राज्य का त्रिकोणीय सहसंबंध था। अतः कार्तिकेयपुर नरेश ललितशूरदेव के ताम्रपत्र और देवपाल के मुंगेर ताम्रपत्र की एकरूपता को इतिहासकार मान्यता देते हैं।

       कन्नौज के त्रिकोणीय संघर्ष पर दृष्टि डालें तो नागभट्ट द्वितीय (800-833 ई.) के संबंध में ग्वालियर अभिलेख महत्वपूर्ण है। इस अभिलेखानुसार उसने कन्नौज पर आक्रमण कर चक्रायुध को वहां से भगा दिया तथा कन्नौज को अपनी राजधानी बनाई। कन्नौज में अपनी स्थिति सशक्त करने के उपरांत उसने मुंगेर के निकट धर्मपाल को पराजित किया। इस राजा ने भी ‘परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की। ग्वालियर अभिलेखानुसार उत्तराखण्ड की प्राचीन जाति ‘किरात’ ने नागभट्ट की अधीनता स्वीकार कर ली थी। इस अभिलेख में उसे आनर्त, किरात, तुरुष्क, वत्य, मत्स्य आदि का विजेता कहा गया है। 

      इस त्रिकोणीय संघर्ष को देखें तो राष्ट्रकूट शासक गोविन्द आगे बढ़ता हुआ हिमालय तक जा पहुँचा था। गोविन्द तृतीय (793-814 ई.) वह राष्ट्रकूट शासक था, जिसने कन्नौज के त्रिकोणीय संघर्ष में नागभट्ट द्वितीय (800-833 ई), इन्द्रायुध और धर्मपाल को पराजित किया था। इस राष्ट्रकूट नरेश का हिमालय अभियान यह सिद्ध करता है कि उत्तराखण्ड का कार्तिकेयपुर राज्य एक शक्तिशाली स्वतंत्र राज्य था। संभवतः ललितशूरदेव उस समय कार्तिकेयपुर के शासक थे। लेकिन दक्षिण की समस्याओं के कारण गोविंद तृतीय वापस लौट गया था। सन् 800 ई. में नागभट्ट द्वितीय और सन् 810 ई. में धर्मपाल के पुत्र देवपाल के हाथां में सत्ता आ चुकी थी। अतः नागभट्ट द्वितीय, गोविंद तृतीय और धर्मपाल के मध्य त्रिकोणीय संघर्ष का द्वितीय चरण सन् 800 से 810 ई. के मध्य रहा था।

ललितशूरदेव ने तीन ताम्रपत्र विजय राज्य संवत् 21, 22 और 24 को निर्गत किये थे। इन तीनों ताम्रपत्रों से कार्तिकेयपुर पर वाह्य आक्रमण का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। संभवतः ललितशूरदेव सन् 780 से के आस पास कार्तिकेयपुर के सिंहासन पर आसित हुए थे। बागेश्वर शिलालेख के तृतीय लेखांश को ललितशूरदेव के पुत्र भूदेवदेव ने विजय राज्य संवत् 4 को उत्कीर्ण करवाया था। इस अभिलेख से भी कार्तिकेयपुर पर वाह्य आक्रमण का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है। लेकिन भूदेवदेव ने परमब्राह्मपरायण’ के अतिरिक्त ’परमबुद्धश्रमणरिपु’ उपाधि धारण की थी, जो यह संकेत करती है कि किसी बौद्ध मतावलम्बी शासक ने भिक्षुओं की सहायता से कार्तिकेयपुर राज्य पर असफल आक्रमण किया था। इस कारण भूदेवदेव बौद्ध-भिक्षुओं का परम शत्रु हो गया। संभवतः यह बौद्ध मतावलम्बी शासक बंगाल का ‘देवपाल’ था, जिसे ‘परमसौगत’ भी कहा गया। 

     बौद्ध लेखक देवपाल को ’परमसौगत’ उपाधि प्रदान करते हैं, वहीं कार्तिकेयपुर नरेश भूदेवदेव ’परमब्राह्मपरायण’ के साथ ’परमबुद्धश्रमणरिपु’ की उपाधि धारण करता है। ‘परमब्राह्मण्य’ उपाधि धारण करने वाले प्रथम कार्तिकेयपुर नरेश ’इष्टगणदेव’ थे। इस राजा के पश्चात इनके पुत्र ललितशूरदेव और पौत्र भूदेवदेव ने भी यह उपाधि धारण की थी। लेकिन ’परमबुद्धश्रमणरिपु’ की उपाधि केवल भूदेवदेव ने धारण की थी। सम्भवतः बौद्ध श्रमणों की सहायता से देवपाल ने कार्तिकेयपुर राज्य पर असफल आक्रमण किया। संभवतः इसी कारण भूदेवदेव ने ’परमबुद्धश्रमणरिपु’ की उपाधि धारण की थी। वह ’परमबुद्धश्रमणरिपु’ उपाधि धारण करने वाला कार्तिकेयपुर का प्रथम और एकमात्र राजा था।

       भूदेवदेव को देवपाल से संबद्ध करने का प्रमुख कारण ’परमबुद्धश्रमणरिपु’ की उपाधि है। ’परमब्राह्मणपरायण’ एक शासक क्यों बौद्ध भिक्षुओं का शत्रु बन बैठा ? निश्चित ही इस प्रश्न का उत्तर बौद्ध श्रमणों का मध्य हिमालय क्षेत्र पर आक्रमण करना था। नौवीं शताब्दी में मध्य हिमालय पर आक्रमण करने की योग्यता पाल शासकों में केवल देवपाल में थी। इसके पश्चात पाल साम्राज्य की अवनति प्रारम्भ हुई और 150 वर्षों तक पाल वंश का कोई भी राजा इतना योग्य नहीं था कि वह बंगाल-बिहार की सीमा के बाहर सैन्य अभियान चला सकता था। धर्मपाल और उसके उत्तराधिकारियों में से देवपाल ही सबसे उपयुक्त शासक था, जो कार्तिकेयपुर राज्य पर आक्रमण करने की योग्यता रखता था।

धर्मपाल के मृत्यूपरांत उसका सुयोग्य पुत्र देवपाल (810-850 ईस्वी) राजसिंहासन पर आसित हुआ। उसके मुंगेर लेख से पता चलता है कि उसने विन्ध्यपर्वत तथा कम्बोज तक सैनिक अभियान चलाया था। बंगाल और कम्बोज के मध्य में स्थित उत्तराखण्ड पर देवपाल ने आक्रमण किया, जिसकी पुष्टि बादल लेख से भी होती है।

बादल लेखानुसार– ‘‘उसका योग्य अमात्य दर्भपाणि था, जो धर्मपाल के अमात्य वीरदेव का पुत्र था। उसकी कूटनीति ने रेवा (नर्मदा) के पिता विन्ध्याचल तथा गौरी के पिता हिमांचल के बीच बसे हुए पश्चिमी समुद्र (अरब सागर) से पूर्वी समुद्र (बंगाल की खाड़ी) तक के सम्पूर्ण क्षेत्र को देवपाल का करद बना दिया। उसने उत्कलों को उखाड़ फेंका, हूणों (बादल लेख के हूणों से तात्पर्य संभवतः मालवा के हूणों से है।) के गर्व को चूर्ण किया तथा द्रविड़ और गुर्जर राजाओं के अभिमान को विदीर्ण कर समुद्रों से घिरी हुई समस्त पृथ्वी पर शासन किया था।’’

देवपाल का सफल सैन्य अभियान गुर्जर शासक नागभट्ट के मृत्यूपरांत ही संभव था। नागभट्ट का उत्तराधिकारी रामभद्र (833-836 ई.) एक निर्बल शासक था। ऐसे समय में पाल शासक देवपाल ने उसे पराजित कर कन्नौज पर अधिकार कर लिया था। यही समय था जब देवपाल के लिए कार्तिकेयपुर पर आक्रमण करना समकालीन राजनीति में उपयुक्त था।

सन् 836 ई. में गुर्जर-प्रतिहार वंश के सिंहासन पर मिहिरभोज (836-885 ई.) आसित हुए। यह राजा अपने वंश का ही नहीं भारत का महान राजा था। यह शासक कन्नौज को गुर्जर प्रतिहार वंश की स्थायी राजधानी बनाने में सफल हुआ। इस प्रकार त्रिकोणीय संघर्ष का तृतीय चरण देवपाल और मिहिरभोज के मध्य सन् 836 से 850 ई. तक चला था। देवपाल की मत्यूपरांत मिहिरभोज उत्तर भारत का एक मात्र सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था। कन्नौज के इस महान राजा से अरब आक्रमणकारी भी भयभीत रहते थे। इस राजा के उत्तराधिकारी महेन्द्रपाल प्रथम (885-910) थे, जिनके राजगुरु राजशेखर थे, जिन्होंने काव्यमीमांसा में कार्तिकेयपुर नगर का उल्लेख किया था।

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