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November 27, 2025December 12, 2025

सोमचंद-एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व

सोमचंद एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व ही नहीं थे, बल्कि कुमाऊँ राज्य के नींव के पहले पत्थर थे। कहा जाता है कि सोमचंद उत्तर प्रदेश के झूसी से चंपावत आये थे। झूसी से कुमाऊँ आने की तिथि तो ज्ञात नहीं, पर सिंहासनारूढ़ होने की तिथि को पंडित रुद्रदत्त पंत ने संवत् 757 विक्रमीय या 622 शाके या सन् 700 निर्धारित किया। इस मत का समर्थन पंडित बद्रीदत्त पाण्डे ने अपनी पुस्तक ‘कुमाऊँ का इतिहास’ में भी किया। जबकि ‘हिमालयन गजेटियर’ के लेखक एडविन थॉमस एटकिंसन (1840-1890) ने सोमचंद के सिंहासनारूढ़ वर्ष को सन् 953 ई. मान्य किया। 

        चंपावत के प्रथम चंद राजा सोमचंद के सिंहासनारूढ़ होने की उक्त दोनों तिथियों में 253 वर्ष का बहुत बड़ा अंतर दिलखाई देता है। रुद्रदत्त पंत और एटकिंसन ने ही कुमाउनी इतिहास को उन्नीसवीं शताब्दी में संकलित करने का आरंभिक प्रयास किया था। एटकिंसन लिखते हैं- ‘‘कुमाऊँ का कोई लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। और इस संबंध में जो भी जानकारी हमारे पास है वह परम्पराओं पर आधारित है। परम्पराओं पर आधारित इन जानकारियों में से बहुत सी हमें स्वर्गीय रुद्रदत्त पंत के लम्बे श्रमसाध्य जीवन से प्राप्त हुईं हैं, रुद्रदत्त पंत अल्मोड़ा के एक विद्वान थे जिनकी सेवाएं हमें जॉन स्ट्रेची की बदौलत प्राप्त हुई थी।’’

अभ्युदय काल- 

        पंडित रुद्रदत्त पंत द्वारा निर्धारित चंद वंशावली को एटकिंसन ने अपने गजेटियर में संकलित किया है, जिसके अनुसार सोमचंद के वंशजों का शासन चंपावत में बीणाचंद तक निरन्तर चलता रहा था। लेकिन बीणाचंद से लगभग दो शताब्दियों तक चंद राजसत्ता चंपावत से विलुप्त हो गई। गजेटियर में प्रकाशित चंद वंशावली के अनुसार सोमचंद से बीणाचंद तक कुल 8 राजा हुए, जिनका शासन काल सन् 700 ई. से 869 ई. तक रहा था। अर्थात 169 वर्षों के कालखण्ड में सोमचंद सहित कुल 8 राजा हुए। औसतन एक राजा का और सोमचंद का शासन काल 21 वर्ष का रहा था। जबकि पांचवें राजा संसारचंद का शासन काल सर्वाधिक 35 वर्ष तथा आठवें राजा बीणाचंद का न्यूनतम् 13 वर्ष का रहा था। बीणाचंद के शासन के तेरहवें वर्ष में स्थानीय खसिया लोगों ने विद्रोह कर दिया और चंपावत से चंद वंश का शासन सुषुप्तावस्था में चला गया। चंद वंश के आरंभिक 169 वर्षों के शासन काल को अभ्युदय काल कह सकते हैं। इस शासनावधि में चंद संभवतः कत्यूरियों के करद थे। 

        सन् 869 ई. से 1067 ई. के कालखण्ड को रुद्रदत्त पंत ने चंपावत के संदर्भ में खसियों का अराजक काल कहा था। इस अराजक काल के कुल 198 वर्षों में चंपावत में चंद वंश अस्तित्व में नहीं था। रुद्रदत्त पंत की चंद वंशावली के अनुसार सन् 1067 ई. में बीरचंद के नेतृत्व में चंद वंश का पुनराभ्युदय हुआ था। 

 पुनरोत्थान काल-

        बीरचंद (1067 ई.) से महान चंद शासक गरुड़ ज्ञानचंद (1374 ई.) तक रुद्रदत्त पंत ने चंद वंशावली में कुल 21 राजाओं का उल्लेख किया है। चौदहवीं शताब्दी के चंद शासक अभयचंद और उनके उत्तराधिकारी गरुड़ ज्ञानचंद के कुछ ताम्रपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। प्रकाशित चंद ताम्रपत्रों से स्पष्ट होता है कि ‘महाराजाधिराज’ उपाधि धारक गरुड़ ज्ञानचंद चंपावत के प्रथम स्वतंत्र चंद शासक थे। इसलिए बीरचंद से अभयचंद के कालखण्ड को चंद वंश का पुनरोत्थान काल (1067 ई-1374 ई.) कह सकते हैं। चंदों के पुनरोत्थान काल के कुल 307 वर्षों मे 20 राजाओं ने औसतन 15 वर्ष शासन किया। इस काल खण्ड के अंतिम शताब्दी में चंद राजा डोटी के मल्ल राजाओं को कर देते थे। 

        पुनरोत्थान काल में ही थोहरचंद चंपावत के राजा हुए, जिन्हें कुछ विद्वान सोमचंद के स्थान पर चंद वंश का संस्थापक कहते हैं। चंदों की पुनरोत्थान कालीन वंशावली में बीरचंद से 15 वें क्रमांक में थोहरचंद का नाम उत्कीर्ण है। चंद वंश के संस्थापक थोहरचंद थे। इस धारणा के संबंध में एटकिंसन लिखते हैं- 

‘‘मिस्टर डब्ल्यू फ्रेजर ने कुमाऊँ के जाने-माने विद्वान हरकदेव जोशी से बातचीत के बाद वर्ष 1813 में सरकार को जो ज्ञापन या मेमोरेंडम भेजा उसके अनुसार चंदों का प्रारंभिक इतिहास इस प्रकार था- पहला राजा एक राजपूत, थोहरचंद था जिसे 16 या 17 वर्ष की आयु में झूसी से लाया गया था। उसका बेटा, पोता और फिर पड़पोता शासनारूढ़ हुए लेकिन इसके आगे उसका वंश रुक गया और थोहरचंद के चाचा के वंशज ज्ञानचंद को झूसी से लाकर सिंहासन पर बिठाया गया।’’

अभिलेखीय चंद राजा-

        पुनरोत्थान कालीन चंद वंशावली (बीरचंद से अभयचंद) में पांचवें और आठवें क्रमांक पर कमशः कर्मचंद और नरचंद का नाम उल्लेखित किया गया है। इन दोनों चंद राजाओं और अभयचंद के अभिलेखीय साक्ष्य चंपावत और आस पास के क्षेत्रों से प्राप्त हो चके हैं। डॉ. रामसिंह लिखते हैं कि- ‘‘बालेश्वर (चंपावत) मंदिर के समीपस्थ नौले की भीतरी दीवार में भी शाके 1178 (सन् 1256 ई.) में राजा कर्मचंद्र का स्पष्ट उल्लेख कुमाऊँ में चंदनाम से ख्यात राजकुल के अभ्युदय के प्रारंभिक काल का द्योतक है।’’ सन् 1256 से 33 वर्ष पूर्व सन् 1223 ई. में दुलू (नेपाल) के शासक क्राचच्लदेव ने उत्तराखण्ड पर आक्रमण किया था। चंपावत नगर के मध्य में स्थित बालेश्वर मंदिर से कार्तिकेयपुर नरेश देशटदेव का एक ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है, जिसके पृष्ठ भाग में नेपाल के दुलू शासक क्राचच्लदेव का लेख उत्कीर्ण है।

माण्डलिक राजा-

        क्राचच्लदेव के बालेश्वर अभिलेख से 10 माण्डलिक राजाओं के नाम प्राप्त होते हैं, जिनमें से चन्द्र नामान्त वाले राजा विनयचन्द्र और वाद्यचन्द्र को विद्वान चंद वंश से संबद्ध करने का प्रयास करते है। अन्य माण्डलिक याहददेव, चन्द्रदेव, हरि रावत, अनिलादित्य रावत, जयसिंह, जीहलदेव, वल्लालदेव और मुसादेव थे। याहद, वल्लाल, जीहल और मुसा नाम वाले माण्डलिक राजाओं को विद्वान खस जाति से संबद्ध करते है। इस संबंध में एटकिंसन लिखते हैं- ‘‘ क्राचच्ल अन्य बौद्ध संतों की तरह उदार था और उसने स्थानीय देवता बालेश्वर के मंदिर को दाननामा किया। माण्डलिक या स्थानीय प्रमुखों के जो नाम हैं उनमें दो रावत राजाओं के हैं जो स्पष्टतः डोमकोट के प्रमुख वंशज हैं तथा ‘जीहल’ और ‘जय’ नामों की तुलना खसिया राजा जाहल और जजु से की जा सकती है।’’ क्राचच्लदेव के बालेश्वर अभिलेख के विनयचंद्र और वाद्यचंद्र का नाम चंद वंशावली के किसी भी नाम सुमेलित नहीं होता है। संभवतः ये दोनों चंद्र उपनाम वाले राजा चंद वंश की अन्य शाखा से थे।

 नौला और ताम्रपत्र अभिलेखीय चंद राजा-

        पंडित रुद्रदत्त पंत की चंद वंशावली के अनुसार कर्मचंद विक्रम संवत् 1178 (सन् 1121 ई.) को सिंहासनारूढ़ हुए थे। कर्मचंद का बालेश्वर नौला अभिलेख शाके 1178 (1256 ई.) और पंडित रुद्रदत्त पंत की चंद वंशावली में तिथि के अंक समान (1178) हैं, पर शाके और विक्रम संवत् में विभेद होने से ईस्वी तिथि अंकना में 135 वषों का अन्तर आ गया। वस्तुतः 1178 की तिथि को या विक्रम या शाके में से एक में पढ़ सकते हैं।

        एक अन्य चंद राजा नरचंद्र का गड़नौला, (लोहाघाट) ताम्रपत्र संवत् 1377 विक्रमी या सन् 1320 प्राप्त हो चुका है। जबकि रुद्रदत्त पंत की चंद वंशावली में नरचंद का उल्लेख पीढ़ीगत क्रमांकानुसार कर्मचंद के पड़पौत्र के स्थान पर किया गया है। बीरचंद से गरुड़ ज्ञानचंद तक चंद वंशावली में नरचंद नाम का एक ही राजा का उल्लेख है। यदि 1178 को विक्रम संवत् में पढे ंतो, सन् 1121 में कर्मचंद सिंहासनारूढ़ हुए। इस आधार पर उनके पड़पौत्र लगभग 199 वर्षोपरांत सन् 1320 में चंद सिंहासन पर कैसे आसित हो सकते हैं ? यदि कर्मचंद की तिथि को शाके 1178 मान्य करें तो, कर्मचंद सन् 1256 ई. में सिंहासनारूढ़ हुए। इस आधार पर उनके पड़पौत्र नरचंद का 64 वर्षोंपरांत सन् 1320 ई. में चंद राजसिंहासन पर आसित होना तर्क संगत है। 

        रुद्रदत्त पंत की चंद वंशावली के अनुसार नरचंद से गरुड़ ज्ञानचंद तक 12 राजा हुए और गरुड़ ज्ञानचंद सन् 1374 ई. में राजसिंहासनारूढ़ हुए। लेकिन ताम्रपत्रीय साक्ष्यों के अनुसार गरुड़ ज्ञानचंद सन् 1378-79 ई. में चंद राजसिंहासन पर आसित हुए थे। अतः नरचंद (1320 ई.) से अभयचंद की मृत्यु, सन् 1378 तक चंद राजसिंहासन पर तक 12 राजा आसित हुए। अभयचंद के अभिलेखीय साक्ष्य प्राप्त हो चुके हैं, जिनमें सन् 1360 ई. का मानेसर मंदिर (चंपावत) शिलालेख, सन् 1371 ई. का बालेश्वर मंदिर लघु-स्तम्भ लेख, सन् 1374 ई. का ताम्रपत्र और सन् 1376 ई. का चौकुनी बोरा (चंपावत) शिलालेख प्रकाशित हो चुके हैं। वार्षिक श्राद्ध के अवसर पर निर्गत गरुड़ ज्ञानचंद का चामी गुर्यूड़ा (चंपावत) ताम्रपत्र (शाके 1301) के आधार पर विद्वान अभयचंद की मृत्यु वर्ष को सन् 1378 ई. निर्धारित करते हैं। 

        अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर पुनरोत्थान कालीन अंतिम चंद राजा अभय चंद के शासन काल को सन् 1360 ई. से 1378 तक अवश्य निर्धारित कर सकते हैं। गरुड़ ज्ञानचंद के खरक कार्की ताम्रपत्र शाके 1306 (सन् 1384 ई.) में पिता कल्याणचंद और पितामह त्रैलोक्यचंद का उल्लेख किया गया है। जबकि पंडित रुद्रदत्त पंत की चंद वंशावली में थोहरचंद के उपरांत क्रमशः कल्याणचंद, त्रिलोकीचंद, डमरचंद, धर्मचंद और अभयचंद का उल्लेख किया गया है। खरक कार्की ताम्रपत्र शाके 1306 के आधार पर चंद वंशावली का सही क्रम इस प्रकार होना चाहिए- थोहरचंद, त्रिलोकीचंद, कल्याणचंद, डमरचंद, धर्मचंद और अभयचंद। अभयचंद का गड़सारी, लोहाघाट ताम्रपत्र शाके (अस्पष्ट) में महाराजा थोहरत अभयचंद उत्कीर्ण है। इस आधार पर विद्वान अभयचंद का सीधा संबंध थोहरचंद से स्थापित करते हैं। 

        एटकिंसन थोहरचंद के संबंध में लिखते हैं- उसका बेटा, पोता और फिर पड़पोता शासनारूढ़ हुए लेकिन इसके आगे उसका वंश रुक गया और थोहरचंद के चाचा के वंशज ज्ञानचंद को झूसी से लाकर सिंहासन पर बिठाया गया।’’ खरक कार्की ताम्रपत्र के तथ्यों को एटकिंसन के तथ्यों से सुमेलित करें तो, गरुड़ ज्ञानचंद के पितामह त्रिलोकीचंद व पिता कल्याणचंद थोहरचंद के चाचा के वंशज थे। इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि थोहरचंद का केवल एक पुत्र, एक पौत्र तथा एक ही पड़पौत्र था, जो क्रमशः डमरचंद, धर्मचंद और अभयचंद था। 

 पंडित रुद्रदत्त पंत की चंद वंशावली-

      नाम            राज्यारोहण की तिथि विक्रम संवत् में     शासनकाल

1- सोमचंद 757 (700 ई.)     21 वर्ष

2- आत्मचंद 778 (721 ई.)    19

3- पूर्णचंद        797 (740 ई.)    18 

4- इन्द्रचंद           815 (758 ई.)      20

5- संसारचंद 835 (778 ई.)      35

6- सुधाचंद 870 (813 ई.)      20

7- हमीरचंद 890 (833 ई.)      23

8- बीणाचंद          913-926 (856-869 ई.)      13

खसियों का अराजक काल    ( 926-1122 (869-1065 ई.)   196

9- बीरचंद         1122 (1065 ई.)      15

10- रूपचंद 1137 (1080 ई.)      13

11- लक्ष्मीचंद          1150 (1093 ई.)    20

12- धर्मचंद  1170 (1113 ई.)        8

13- कर्मचंद           1178 (1121 ई.)          19

14- कल्याणचंद         1197 (1140 ई.)          9

15- निर्भयचंद          1206 (1149 ई.)       21

16- नरचंद 1227 (1170 ई.) 7

17- नानकीचंद         1234 (1177 ई.)        18

18- रामचंद 1252 (1195 ई.)        10

19- भीकमचंद          1262 (1205 ई.)         21

20- मेघचंद 1283 (1226 ई.)   7

21- ध्यानचंद          1290 (1233 ई.)         19

22- पर्वतचंद          1309 (1252 ई.) 9

23- थोहरचंद         1318 (1261 ई.)        14

24- कल्याणचंद          1332 (1275 ई.)         21

25- त्रिलोकीचंद          1353 (1296 ई.)   7

26- डमरचंद 1360 (1303 ई.) 18

27- धर्मचंद 1378 (1321 ई.) 23

28- अभयचंद         1401 (1344 ई.) 30

29- गरुड़ ज्ञानचंद 1431 (1374 ई.) – 1476 (1419 ई.)   

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